नई दिल्ली: देश में चीनी की बढ़ती कीमतों को लेकर एथनॉल मिश्रण नीति पर सवाल उठ रहे हैं, लेकिन चीनी उद्योग के विशेषज्ञ इसे महंगाई की एकमात्र वजह मानने से इनकार कर रहे हैं। उनके मुताबिक गन्ने का घटता रकबा, कम उत्पादन, पेराई सत्र में कमी, निर्यात और बाजार में स्टॉकिंग जैसे कई कारणों ने चीनी की उपलब्धता को प्रभावित किया है।
कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2022-23 में करीब 59 लाख हेक्टेयर में गन्ने की खेती हुई थी, जो 2024-25 में घटकर लगभग 54.5 लाख हेक्टेयर रह गई। इसी दौरान गन्ने का उत्पादन भी करीब 49 करोड़ टन से घटकर 45.3 करोड़ टन के आसपास पहुंच गया।
पेराई सत्र घटा, उत्पादन पर असर
चीनी उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार महाराष्ट्र में कई मिलों का पेराई सत्र पहले करीब 150 दिन रहता था, जो अब घटकर लगभग 100 दिन रह गया है। इससे चीनी उत्पादन और बाजार में उपलब्धता दोनों प्रभावित हुए हैं।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि शुरुआती अनुमान की तुलना में वास्तविक चीनी उत्पादन काफी कम रहा। करीब 390 लाख टन उत्पादन का अनुमान लगाया गया था, लेकिन उत्पादन लगभग 310 लाख टन तक ही पहुंच सका। इसके साथ ही लगभग आठ लाख टन चीनी के निर्यात की अनुमति से घरेलू बाजार में उपलब्ध स्टॉक पर अतिरिक्त दबाव पड़ा।
एथनॉल पर क्या है विशेषज्ञों की राय?
चीनी उद्योग के जानकारों का कहना है कि एथनॉल को पूरी तरह जिम्मेदार ठहराना सही नहीं होगा। उनके मुताबिक अब एथनॉल उत्पादन में अनाज की हिस्सेदारी भी काफी बढ़ चुकी है। इसलिए चीनी की कीमतों को समझने के लिए गन्ने की उपलब्धता और कुल चीनी उत्पादन को भी देखना जरूरी है।
मौसम संबंधी आशंकाओं के बीच व्यापारियों द्वारा बड़े पैमाने पर चीनी खरीदकर स्टॉक किए जाने को भी कीमत बढ़ने की एक वजह माना जा रहा है। सरकार ने बाजार में चीनी की उपलब्धता और स्टॉक पर निगरानी बढ़ाने के लिए नियम लागू किए हैं।
जानकारों का मानना है कि चीनी की कीमतों को स्थिर रखने के लिए केवल एथनॉल नीति पर बहस के बजाय गन्ने का रकबा, उत्पादन, मिलों की पेराई अवधि, निर्यात और घरेलू स्टॉक—सभी पहलुओं पर एक साथ ध्यान देना होगा।
