बलूचिस्तान: क्षेत्रफल के लिहाज से पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत बलूचिस्तान लंबे समय से राजनीतिक अस्थिरता, अलगाववादी आंदोलन और संसाधनों के बंटवारे को लेकर चर्चा में रहा है। हाल में खुद को ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ बताने वाले संगठन की ओर से संयुक्त राष्ट्र को भेजी गई चिट्ठी ने एक बार फिर स्वतंत्र बलूचिस्तान की मांग को अंतरराष्ट्रीय बहस में ला दिया है।
संगठन ने संयुक्त राष्ट्र से बलूचिस्तान की स्वतंत्र स्थिति पर विचार करने की अपील की है। उसका दावा है कि बलूचिस्तान ऐतिहासिक रूप से पाकिस्तान का हिस्सा नहीं रहा और उसका पाकिस्तान में विलय सहमति से नहीं हुआ था।
अगर कभी बलूचिस्तान पाकिस्तान से अलग होता है, तो इसका असर केवल राजनीतिक नहीं होगा। प्राकृतिक संसाधनों, ऊर्जा, समुद्री तट और ग्वादर पोर्ट की वजह से इसका आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव भी काफी बड़ा हो सकता है।
पाकिस्तान के करीब 44 फीसदी क्षेत्र में फैला है बलूचिस्तान
बलूचिस्तान पाकिस्तान के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में स्थित है और क्षेत्रफल के लिहाज से देश का सबसे बड़ा प्रांत है। पाकिस्तान के कुल भूभाग का करीब 44 फीसदी हिस्सा इसी प्रांत में आता है, जबकि आबादी के लिहाज से यह देश का सबसे कम आबादी वाला प्रांत है।
इसके उत्तर में अफगानिस्तान, पश्चिम में ईरान, दक्षिण में अरब सागर और पूर्व में सिंध तथा पंजाब स्थित हैं। इसकी भौगोलिक स्थिति इसे पाकिस्तान के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाती है।
770 किलोमीटर लंबी समुद्री सीमा
अरब सागर से लगी बलूचिस्तान की करीब 770 किलोमीटर लंबी तटरेखा है। यही वजह है कि यहां मौजूद समुद्री क्षेत्र और बंदरगाहों का महत्व पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के साथ-साथ क्षेत्रीय व्यापार के लिहाज से भी काफी है।
प्रांत में सोना, तांबा, लौह अयस्क, यूरेनियम, कोयला, क्रोमाइट, बैराइट, सल्फर, संगमरमर, क्वार्टजाइट और चूना पत्थर जैसे खनिज पाए जाते हैं।
यहां मौजूद रेको डिक खदान सोने और तांबे के बड़े भंडार के लिए जानी जाती है।
पाकिस्तान की ऊर्जा व्यवस्था में भी अहम भूमिका
बलूचिस्तान प्राकृतिक गैस और तेल के भंडार के लिए भी जाना जाता है। पाकिस्तान में प्राकृतिक गैस की पहली बड़ी खोज 1952 में डेरा बुगती जिले की सुई तहसील में हुई थी। सुई गैस क्षेत्र पाकिस्तान के प्रमुख गैस क्षेत्रों में शामिल है।
प्रांत में तेल और गैस के अलावा कोयला समेत कई अन्य खनिज संसाधन भी हैं। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक पाकिस्तान के तेल उत्पादन में भी बलूचिस्तान की हिस्सेदारी महत्वपूर्ण है, जबकि उसकी अपनी ऊर्जा खपत तुलनात्मक रूप से कम है।
पाकिस्तान की GDP में करीब 5.3 फीसदी योगदान
उपलब्ध आर्थिक आंकड़ों के मुताबिक 2022 में बलूचिस्तान का पाकिस्तान की GDP में योगदान करीब 5.33 फीसदी था। यह हिस्सा करीब 20 अरब डॉलर के आसपास बताया गया है।
इसके बावजूद प्रांत में गरीबी, रोजगार, बुनियादी ढांचे और विकास से जुड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं। यही आर्थिक असमानता लंबे समय से बलूचिस्तान की राजनीति और सामाजिक आंदोलनों में एक प्रमुख मुद्दा रही है।
खेती के लिए सीमित जमीन, फिर भी कृषि पर निर्भर आबादी
बलूचिस्तान का बड़ा हिस्सा पहाड़ी और शुष्क क्षेत्र है। उपलब्ध विवरण के अनुसार प्रांत के कुल क्षेत्रफल का करीब छह फीसदी हिस्सा ही खेती योग्य है।
इसके बावजूद बड़ी संख्या में लोग कृषि और उससे जुड़ी गतिविधियों पर निर्भर हैं। बलूचिस्तान फल उत्पादन के लिए भी जाना जाता है। यहां खजूर, सेब, अंगूर, आड़ू, खुबानी, जैतून, चेरी, बेर, बादाम, पिस्ता और अनार की कई किस्में उगाई जाती हैं।
ग्वादर पोर्ट क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
बलूचिस्तान में स्थित ग्वादर पोर्ट पाकिस्तान और चीन की रणनीतिक साझेदारी का अहम हिस्सा है। यह बंदरगाह चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) से जुड़ा है।
पाकिस्तान ग्वादर को केवल कराची के विकल्प के तौर पर नहीं, बल्कि चीन और मध्य एशिया को अरब सागर से जोड़ने वाले व्यापारिक और लॉजिस्टिक केंद्र के रूप में विकसित करना चाहता है।
यही वजह है कि बलूचिस्तान की राजनीतिक स्थिति का असर ग्वादर और CPEC से जुड़ी योजनाओं पर भी पड़ सकता है।
आजादी की मांग कितनी पुरानी है?
बलूचिस्तान में अलगाव की मांग नई नहीं है। विभिन्न बलूच संगठनों की ओर से अलग-अलग समय पर राजनीतिक और सशस्त्र आंदोलन चलाए गए हैं।
बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) और बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट (BLF) जैसे संगठनों पर पाकिस्तान में सशस्त्र गतिविधियों के आरोप लगते रहे हैं। दूसरी ओर कुछ राजनीतिक और सामाजिक समूह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बलूचिस्तान की स्वतंत्रता का मुद्दा उठाते रहे हैं।
हाल में ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ की ओर से संयुक्त राष्ट्र को भेजी गई अपील में स्वतंत्रता, मानवाधिकारों की अंतरराष्ट्रीय निगरानी और प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय लोगों के अधिकार समेत कई मांगें रखी गई हैं।
बलूचिस्तान के पाकिस्तान में विलय का इतिहास
1947 में ब्रिटिश भारत के विभाजन के समय बलूचिस्तान कई राजनीतिक इकाइयों में बंटा हुआ था। इनमें कलात, खारन, लासबेला और मकरान प्रमुख थे।
दिए गए ऐतिहासिक विवरण के मुताबिक खारन, लासबेला और मकरान पाकिस्तान के साथ जाने को तैयार हो गए थे, जबकि कलात के शासक ने स्वतंत्र रहने की इच्छा जताई थी।
इसके बाद पाकिस्तान और कलात के बीच बातचीत हुई। मार्च 1948 में कलात के पाकिस्तान में विलय की घोषणा हुई और इसके बाद पाकिस्तानी सेना की कार्रवाई भी हुई। बलूच राष्ट्रवादी समूह इस घटनाक्रम को अपने अलगाव के ऐतिहासिक आधार के तौर पर पेश करते हैं।
क्या बलूचिस्तान सच में अलग देश बन सकता है?
यह सवाल फिलहाल राजनीतिक दावे और संभावनाओं के स्तर पर है। किसी क्षेत्र का स्वतंत्र देश बनना केवल अलगाववादी संगठन की घोषणा से तय नहीं होता। इसके लिए जमीन पर राजनीतिक नियंत्रण, संस्थागत क्षमता, अंतरराष्ट्रीय संबंध और व्यापक अंतरराष्ट्रीय मान्यता जैसे कई कारक महत्वपूर्ण होते हैं।
बलूचिस्तान के अलग देश बनने को लेकर अलग-अलग विशेषज्ञों के विचार भी सामने आते रहे हैं। कुछ विश्लेषक इसकी संभावना पर जोर देते हैं, जबकि पाकिस्तान की संप्रभुता और मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था के संदर्भ में इसे एक लंबी और जटिल प्रक्रिया माना जाता है।
इसलिए फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि बलूचिस्तान कब या किस रूप में पाकिस्तान से अलग हो सकता है। हालांकि, इसके प्राकृतिक संसाधन, ग्वादर की रणनीतिक स्थिति और लंबे समय से चल रहा अलगाववादी आंदोलन इसे पाकिस्तान के भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण मुद्दा जरूर बनाते हैं।
