उत्तराखंड में विकास कार्यों की रफ्तार बढ़ाने की तैयारी, जमीन और वन मंजूरी की अड़चनों पर होगा वार

 

 

 

देहरादून: उत्तराखंड में विकास परियोजनाओं को जमीन, वन मंजूरी और अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं के कारण होने वाली देरी से बचाने के लिए सरकार ने विभागीय समन्वय मजबूत करने पर जोर दिया है। लोक निर्माण विभाग के सचिव डॉ. पंकज कुमार पांडेय ने अधिकारियों को लंबित मामलों की बाधाएं चिह्नित कर उनके व्यावहारिक और नियमसम्मत समाधान तैयार करने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि विकास कार्यों को गति देने के लिए समयबद्ध कार्रवाई और संबंधित विभागों के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है।

भूमि अधिग्रहण से लेकर वन मंजूरी तक की समस्याओं पर चर्चा

गुरुवार को सचिवालय में राज्य-विशिष्ट प्रारूप टिप्पणी (स्टेट-स्पेसिफिक ड्राफ्ट नोट) को अंतिम रूप देने के लिए बैठक आयोजित की गई। इसमें विकास परियोजनाओं के क्रियान्वयन में आ रही चुनौतियों और विभिन्न विभागों से मिले सुझावों पर चर्चा हुई।

बैठक में भूमि अधिग्रहण, वन भूमि हस्तांतरण, जमीन का कब्जा सौंपने, भूमि नामांतरण, यूटिलिटी शिफ्टिंग और लैंड बैंक जैसे मुद्दे उठाए गए। इसके अलावा पीएम गतिशक्ति, भूमि राशि और परिवेश पोर्टल से जुड़ी प्रक्रियाओं की समीक्षा की गई। राइट ऑफ वे से बाहर स्थित संपत्तियों को नुकसान होने पर मुआवजे और रॉयल्टी संबंधी विषयों पर भी विचार किया गया।

सिंगल विंडो व्यवस्था को प्रभावी बनाने पर जोर

सचिव ने ठेकेदारों की ओर से सिंगल विंडो व्यवस्था के तहत प्रस्तुत आवेदनों पर समय से अनुमति देने की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने के सुझावों पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि परियोजनाओं से जुड़ी एजेंसियों को प्रत्येक मामले का पूरा दस्तावेजीकरण करना चाहिए और संबंधित कानूनों, नियमों तथा केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशों का गहन अध्ययन करना चाहिए।

उन्होंने राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम सहित संबंधित कानूनों और प्रक्रियाओं के आधार पर मामलों का आकलन करने को कहा, ताकि समाधान नियमों के अनुरूप निकाला जा सके।

स्थानीय लोगों से संवाद कर निकालें समाधान

डॉ. पांडेय ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि विकास परियोजनाओं से जुड़े मामलों में स्थानीय लोगों की समस्याओं और परिस्थितियों को भी समझा जाए। संबंधित विभाग और परियोजना क्रियान्वयन एजेंसियां अपने स्तर पर पहल करते हुए बाधाओं को दूर करने के लिए ठोस कार्ययोजना तैयार करें।

उन्होंने कहा कि जहां नियमों या प्रक्रियाओं में बदलाव की जरूरत हो, वहां ऐसे मामलों को स्पष्ट रूप से चिह्नित कर उचित प्रस्ताव प्रस्तुत किए जाएं। जिन अधिकारियों और कर्मचारियों को तकनीकी या प्रक्रियागत प्रशिक्षण की आवश्यकता है, उनके लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएं।

 

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