नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को केंद्र सरकार को जाति जनगणना रोकने का निर्देश देने की मांग वाली जनहित याचिका को खारिज कर दिया। साथ ही कोर्ट ने याचिका में इस्तेमाल की गई भाषा को लेकर याचिकाकर्ता को कड़ी फटकार भी लगाई।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत याचिकाकर्ता की दलीलों से स्पष्ट रूप से नाराज नजर आए। उन्होंने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि याचिका में “अशोभनीय और असम्मानजनक भाषा” का प्रयोग किया गया है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि आखिर इस तरह की भाषा किसके द्वारा तैयार की गई है।
मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ में जॉयमाल्या बागची और विपुल एम पंचोली भी शामिल थे। पीठ ने सुनवाई के बाद याचिका को खारिज कर दिया।
याचिका में क्या थी मांग?
याचिका में केंद्र सरकार को एकल संतान वाले परिवारों के लिए आर्थिक प्रोत्साहन देने की नीति बनाने का निर्देश देने की मांग भी की गई थी। इसके अलावा 2027 की जनगणना में जाति आधारित आंकड़ों के संग्रह और सत्यापन की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए गए थे।
गौरतलब है कि इससे पहले भी शीर्ष अदालत ऐसी ही एक याचिका पर सुनवाई से इनकार कर चुकी है। प्रस्तावित 2027 की जनगणना देश की 16वीं राष्ट्रीय जनगणना होगी, जिसमें 1931 के बाद पहली बार व्यापक स्तर पर जाति आधारित आंकड़ों को शामिल किया जाएगा। साथ ही यह देश की पहली पूर्ण डिजिटल जनगणना भी होगी।
