नैनीताल: उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय राजमार्ग-74 भूमि अधिग्रहण से जुड़े मुआवजा विवाद में बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने मुआवजा राशि बढ़ाने की मांग को लेकर दायर डेढ़ दर्जन से अधिक याचिकाओं पर सुनवाई से इनकार करते हुए स्पष्ट किया कि निर्धारित समयसीमा का पालन न करने पर सीधे रिट याचिका के जरिए राहत नहीं मिल सकती।
न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की एकलपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ताओं के पास पहले से ही वैकल्पिक कानूनी उपाय मौजूद हैं। ऐसे में संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत सीधे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना उचित नहीं है। इसी आधार पर कोर्ट ने सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता ‘मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996’ की धारा 34 के तहत जिला न्यायाधीश के समक्ष अपील कर सकते हैं। चूंकि कानून में स्पष्ट वैकल्पिक उपाय उपलब्ध है, इसलिए रिट याचिकाएं विचारणीय नहीं हैं।
यह मामला काशीपुर से सितारगंज के बीच NH-74 चौड़ीकरण के लिए अधिग्रहित भूमि से जुड़ा है, जिसमें वर्ष 2015 और 2017 में मुआवजा अवार्ड पारित किए गए थे। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि आर्थिक स्थिति और कानूनी जानकारी के अभाव के कारण वे समय पर अवार्ड को चुनौती नहीं दे सके और करीब सात साल बाद मुआवजा बढ़ाने की मांग की।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि ‘राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम’ में मुआवजा बढ़ाने के लिए कोई निश्चित समयसीमा तय नहीं है। वहीं भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने इसका विरोध करते हुए कहा कि ‘परिसीमा अधिनियम’ के तहत अधिकतम तीन वर्ष की समयसीमा लागू होती है।
कोर्ट ने यह भी माना कि इस मुद्दे पर अंतिम निर्णय अभी सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, लेकिन मौजूदा कानूनी व्यवस्था के तहत उपलब्ध वैकल्पिक उपायों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
अंततः हाईकोर्ट ने उधम सिंह नगर के कलेक्टर के फैसले को सही ठहराते हुए याचिकाकर्ताओं को संबंधित जिला न्यायालय में जाने की छूट दी है।