‘झंडू’ कहकर उड़ाया था मजाक, उसी नाम ने कॉमनवेल्थ में भारत को दिलाया पहला मेडल

 

 

 



TMP: कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत का पहला पदक जीतने वाले पैरा पावरलिफ्टर झंडू कुमार आज करोड़ों युवाओं के लिए प्रेरणा बन गए हैं। पुरुषों के हैवीवेट वर्ग में उन्होंने 190 किलोग्राम भार उठाकर कांस्य पदक अपने नाम किया। 196 किलो के स्वर्ण पदक वाले अंतिम प्रयास में वह मामूली तकनीकी चूक से चूक गए, लेकिन उनकी उपलब्धि ने पूरे देश का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया।

तानों को बनाया ताकत

बिहार के नालंदा जिले के हरनौत गांव के रहने वाले झंडू कुमार का बचपन संघर्षों से भरा रहा। पांच साल की उम्र में पोलियो होने के बाद इलाज में परिवार की जमा-पूंजी खत्म हो गई। पिता सब्जी बेचकर घर चलाते थे। लोग ताना मारते थे—“तुम्हारे बेटे ने सब झंडू कर दिया।” यही ताना आगे चलकर उनकी पहचान बन गया।

गरीबी के बीच नहीं टूटा हौसला

खेल का खर्च उठाने के लिए झंडू सब्जी बेचते थे, दोस्तों से उधार लेकर ई-रिक्शा भी चलाया। शुरुआती दिनों में उन्होंने शॉटपुट और डिस्कस थ्रो में हाथ आजमाया, लेकिन जिम में ट्रेनिंग के दौरान उनकी ताकत ने उन्हें पैरा पावरलिफ्टिंग की राह दिखा दी।

रिकॉर्ड से पोडियम तक

पैरालंपिक पदक विजेता राजेंद्र सिंह राहेलू की देखरेख में प्रशिक्षण मिलने के बाद झंडू ने लगातार नई ऊंचाइयां हासिल कीं। 2025 की राष्ट्रीय चैंपियनशिप में 205 किलो भार उठाकर राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया और बाद में खेलो इंडिया पैरा गेम्स में 206 किलो उठाकर अपना ही रिकॉर्ड तोड़ दिया। बीजिंग वर्ल्ड कप और एशियन-ओशिनिया चैंपियनशिप में भी उन्होंने कांस्य पदक जीतकर अपनी क्षमता साबित की।

‘गोल्ड नहीं मिला, लेकिन कोई अफसोस नहीं’

पदक जीतने के बाद झंडू कुमार ने कहा कि खुशी इतनी ज्यादा थी कि पूरी रात नींद नहीं आई। उन्होंने माना कि अंतिम प्रयास में सांस लेने की जल्दबाजी के कारण स्वर्ण पदक हाथ से निकल गया, लेकिन भारत के लिए पहला पदक जीतना उनके लिए किसी सपने के सच होने से कम नहीं है।

गरीबी, पोलियो और तानों से लड़कर कॉमनवेल्थ पोडियम तक पहुंचने वाले झंडू कुमार की कहानी यह साबित करती है कि हौसले के आगे कोई भी चुनौती बड़ी नहीं होती।

 
 
 
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