1987 के दस्तावेजों ने फिर खोला नंदा देवी राजजात के ‘मूल’ का सवाल

 

 

 

चमोली: नंदा देवी राजजात यात्रा को लेकर सामने आए वर्ष 1987 के पुराने दस्तावेज यात्रा की ऐतिहासिक परंपराओं और इसके पारंपरिक मार्गों पर नई चर्चा को जन्म देते हैं। उपलब्ध दस्तावेजों में एक ओर 1987 की यात्रा का विस्तृत पड़ाव और कार्यक्रम दर्ज है, वहीं दूसरी ओर उसी दौर की समाचार-पत्र कतरन में राजजात के मूल और कुरुड़-नौटी की परंपराओं का उल्लेख मिलता है।

1987 की यात्रा से जुड़े मार्ग-पत्र में कुरुड़ सिद्धपीठ से यात्रा की शुरुआत और आगे के विभिन्न पड़ावों का विवरण दर्ज है। इसमें नन्दकेसरी, बाण, बेदनी, रूपकुंड और होमकुंड समेत कई प्रमुख पड़ावों का उल्लेख किया गया है। दस्तावेज पर राज राजेश्वरी नन्दादेवी कमेटी, कुरुड़ से जुड़े पदाधिकारियों के नाम और मुहर भी दिखाई देती है।

इसी दौर की 5 जनवरी 1987 की ‘गढ़वाणी’ समाचार-पत्र कतरन में प्रकाशित ‘राजजात का मूल’ शीर्षक लेख इस परंपरा के एक अहम पहलू को सामने रखता है। लेख में कुरुड़ और नौटी, दोनों की धार्मिक एवं पारंपरिक भूमिका का उल्लेख करते हुए राजजात के मूल मार्ग को लेकर चली आ रही बहस पर चर्चा की गई थी।

दस्तावेज में यह भी सामने आता है कि तत्कालीन समय में राजजात के आयोजन और व्यवस्थाओं को लेकर सरकारी स्तर पर भी तैयारी चल रही थी। लेख में कुरुड़ से नन्दकेसरी तक के पारंपरिक मार्ग और उससे जुड़ी व्यवस्थाओं पर ध्यान देने की मांग का उल्लेख मिलता है।

कुरुड़ और नौटी—दोनों की अपनी परंपरा

इन ऐतिहासिक अभिलेखों से यह संकेत मिलता है कि नंदा देवी राजजात की परंपरा को केवल एक स्थान तक सीमित करके देखना आसान नहीं है। नौटी और कुरुड़ दोनों ही इस धार्मिक यात्रा की परंपरा, डोली और पूजा-विधान से जुड़े रहे हैं।

1987 के दस्तावेज इस बात की महत्वपूर्ण झलक देते हैं कि उस समय राजजात के मार्ग, आयोजन और पारंपरिक अधिकारों को लेकर किस तरह की चर्चा मौजूद थी। ऐसे पुराने अभिलेख आज की पीढ़ी के लिए यात्रा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उससे जुड़ी स्थानीय परंपराओं को समझने का महत्वपूर्ण आधार बन सकते हैं।

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