महिला नर्सरी योजना पर सवाल: अपने ही मॉडल से दूरी बना रहा वन विभाग, मंत्री ने जताई नाराजगी

photo - forest.uk

 

 

 

 

देहरादून: उत्तराखंड में महिला सशक्तिकरण और स्वरोजगार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू की गई महिला नर्सरी योजना अब सवालों के घेरे में आ गई है। हालात यह हैं कि जिस वन विभाग ने इस पहल की शुरुआत की, वही अब इन नर्सरियों से पौधे खरीदने से परहेज करता नजर आ रहा है। पूरे मामले पर वन मंत्री ने भी कड़ी नाराजगी जताई है।

राज्य के विभिन्न पर्वतीय क्षेत्रों में महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए नरेंद्र नगर, टिहरी, बदरीनाथ, अलकनंदा, टौंस, पिथौरागढ़, चंपावत और अल्मोड़ा समेत आठ वन प्रभागों में महिला नर्सरियों की स्थापना की गई थी। इनका उद्देश्य महिलाओं को नर्सरी प्रबंधन से जोड़कर रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना था। शुरुआत में इसे एक सकारात्मक पहल माना गया, लेकिन अब इसकी जमीनी हकीकत निराशाजनक दिखाई दे रही है।

वन विभाग ने कुल 12 महिला नर्सरियां स्थापित कीं, जहां 1.5 लाख से अधिक पौधे तैयार किए गए। इसके बावजूद विभाग ने इन नर्सरियों से एक भी पौधा नहीं खरीदा। दूसरी ओर, अन्य विभागों ने जरूर इनसे हजारों पौधे खरीदे, जिससे यह स्पष्ट होता है कि समस्या गुणवत्ता या उपलब्धता की नहीं, बल्कि विभागीय प्राथमिकता की है।

हर साल राज्य में बड़े स्तर पर वृक्षारोपण अभियान चलाया जाता है, जिसमें करोड़ों पौधे लगाए जाते हैं। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि जब इतनी बड़ी संख्या में पौधों की जरूरत होती है, तो महिला नर्सरियों को इसमें शामिल क्यों नहीं किया जा रहा। माना जा रहा है कि विभाग द्वारा पौधों की खरीद निजी नर्सरियों से की जा रही है, जिससे सरकारी योजना की विश्वसनीयता पर भी असर पड़ रहा है।

वन मंत्री ने एक पत्र के माध्यम से स्पष्ट किया कि महिला नर्सरियों के प्रति विभाग का रवैया योजना की मूल भावना के विपरीत है। उन्होंने निर्देश दिए हैं कि पौधारोपण कार्यक्रमों में महिला नर्सरियों से अनुबंध के आधार पर पौधों की खरीद सुनिश्चित की जाए। साथ ही प्रत्येक वन प्रभाग में कम से कम एक नई महिला नर्सरी स्थापित करने के निर्देश भी दिए गए हैं।

सरकार ने यह भी निर्णय लिया है कि महिला नर्सरियों में तैयार पौधों के लिए निर्धारित दरें तय की जाएंगी, ताकि खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे। इसके अलावा ग्रामीण महिलाओं को नर्सरी प्रबंधन में दक्ष बनाने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे।

यह मामला राज्य में योजनाओं के क्रियान्वयन की चुनौतियों को उजागर करता है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो महिला नर्सरी योजना अपने उद्देश्य से भटक सकती है। वहीं, यदि वन विभाग अपने रवैये में बदलाव लाता है, तो यह पहल महिलाओं के लिए सशक्त रोजगार का माध्यम बनने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण को भी नई दिशा दे सकती है।

 
 
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