देहरादून: उत्तराखंड में अब वन संरक्षण और प्रबंधन को आधुनिक तकनीकों और समुदाय आधारित मॉडल के साथ एक नई दिशा दी जा रही है। पिथौरागढ़ और चंपावत जिलों में 2024-25 से 2033-34 तक के लिए बनाई गई 10 वर्षीय पुनरीक्षित कार्ययोजनाओं को केंद्र सरकार की मंजूरी मिल गई है। यह योजनाएं प्रदेश के वन प्रबंधन को वैज्ञानिक, समावेशी और पर्यावरणीय दृष्टि से अधिक सक्षम बनाएंगी।
इन योजनाओं में पहली बार अत्याधुनिक सैटेलाइट तकनीक — Indian Remote Sensing Satellite IRS-P6 के LISS-IV सेंसर (5.8 मीटर रेजोल्यूशन) — का प्रयोग किया गया है। यह तकनीक पारंपरिक LISS-III (23.5 मीटर) से चार गुना अधिक स्पष्टता और सटीकता प्रदान करती है, जिससे वनों के प्रकार, घनत्व और सीमाओं का वर्गीकरण बेहतर तरीके से किया जा सकेगा।
वन घनत्व में आए बदलाव की सटीक निगरानी
2013 से 2021 के बीच हुए विश्लेषण में पिथौरागढ़ में 10,899 हैक्टेयर क्षेत्र में वन घनत्व में वृद्धि और 13,333 हैक्टेयर में कमी दर्ज की गई, जबकि चंपावत में 14,992 हैक्टेयर में वृद्धि और 11,903 हैक्टेयर में कमी देखी गई। यह आकलन वन घनत्व परिवर्तन मैट्रिक्स के जरिये किया गया, जो भविष्य की नीतियों को आकार देने में उपयोगी होगा।
सामुदायिक सहभागिता और सामाजिक सरोकारों पर ज़ोर
मुख्य वन संरक्षक अनुसंधान शाखा संजीव चतुर्वेदी के अनुसार, कार्ययोजना में पहली बार आरक्षित वनों से सटे गांवों में सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण कर यह जाना गया कि स्थानीय समुदाय वनों पर कितनी निर्भरता रखते हैं। इससे संसाधनों पर दबाव का आकलन कर सहभागिता आधारित संरक्षण मॉडल विकसित किया जाएगा।
जैव विविधता संरक्षण और ‘नो-गो ज़ोन’ की घोषणा
पिथौरागढ़ के हीरागुमरी, दारमा वैली और चंपावत के मायावती, श्यामलाताल जैसे क्षेत्रों को उच्च अनुवांशिक विविधता वाले ‘नो-गो जोन’ घोषित किया जाएगा। इन स्थानों पर बीज संरक्षण, इन-सीटू संरक्षण और फील्ड जीन बैंक की स्थापना की जाएगी।
साहसिक पर्यटन से आजीविका को मिलेगा बल
दोनों जिलों में कुल 24 नए ट्रैकिंग रूट और कई प्राकृतिक पर्यटन स्थलों का विकास किया जाएगा। इससे स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा और वन संरक्षण में समुदाय की भागीदारी भी बढ़ेगी।
पौधारोपण और आक्रामक प्रजातियों पर नियंत्रण
पिथौरागढ़ में 255 हैक्टेयर और चंपावत में 203 हैक्टेयर क्षेत्र में पौधारोपण होगा। बांस, रिंगाल और मियावाकी पद्धति से रोपण किया जाएगा। आक्रामक प्रजातियों जैसे लैटाना और कालाबांसा के उन्मूलन की योजना भी इसमें शामिल है।
संस्कृति, आस्था और प्रकृति का समन्वय
पिथौरागढ़ के 9 पवित्र उपवन और चंपावत के 15 सांस्कृतिक स्थलों का संरक्षण किया जाएगा। इन स्थलों का दस्तावेजीकरण कर आस्था, जैव विविधता और पर्यटन को जोड़ने की पहल की गई है।
जलवायु अनुकूलन और मृदा विश्लेषण
हर वनराजि में स्वचालित मौसम केंद्र, GIS आधारित मृदा स्वास्थ्य विश्लेषण और प्रमुख प्रजातियों की फेनोलॉजिकल मॉनिटरिंग की व्यवस्था की जा रही है, जिससे पौधारोपण की गुणवत्ता और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को बेहतर तरीके से समझा जा सकेगा।
उत्तराखंड में वन प्रबंधन की यह नई पहल सिर्फ तकनीकी नवाचार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें स्थानीय समुदायों की भागीदारी, आजीविका संवर्धन, पारिस्थितिकी और सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण का अद्भुत संगम है। यह कार्ययोजना आने वाले वर्षों में वनों को बचाने के साथ-साथ लोगों के जीवन को भी हरित और समृद्ध बनाने में अहम भूमिका निभाएगी।
