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आपदा प्रबंधन पर सवालों की गूंज: सूर्यकांत धस्माना के तीखे सवालों पर हरीश रावत का जवाब, ‘साफ़ और सटीक’

 

 

 

देहरादून:  उत्तराखंड में हाल की आपदाओं और भगदड़ की घटनाओं ने न सिर्फ जनमानस को झकझोरा है, बल्कि आपदा प्रबंधन विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सूर्यकांत धस्माना ने इस मुद्दे को लेकर तीखा सवाल उठाया है—”उत्तराखंड में आखिर आपदा प्रबंधन विभाग है किसलिए?”

उन्होंने कहा कि चारधाम यात्रा, कांवड़ यात्रा, कुंभ और अर्धकुंभ जैसे आयोजनों में हर साल लाखों की भीड़ उमड़ती है। इसके बावजूद राज्य में भीड़ प्रबंधन और आपदा निवारण की कोई ठोस व्यवस्था अब तक क्यों नहीं बन पाई? उन्होंने पूछा कि राज्य के नेताओं, खासकर मुख्यमंत्रियों ने अब तक इस दिशा में क्या ठोस पहल की है?

धस्माना ने मौजूदा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के साथ-साथ पूर्व मुख्यमंत्रियों हरीश रावत, त्रिवेंद्र सिंह रावत और रमेश पोखरियाल निशंक से भी जवाब तलब किया। उन्होंने यहां तक कह दिया कि उत्तराखंड का आपदा प्रबंधन विभाग “सबसे नाकारा विभाग” बनकर रह गया है।

हरीश रावत का जवाब

धस्माना के सवालों का उत्तर देते हुए पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने सोशल मीडिया पर एक विस्तृत और तथ्यों पर आधारित जवाब दिया। उन्होंने अपने कार्यकाल (2014-2016) की याद दिलाते हुए कहा कि—

“जून 2013 की महाविनाशकारी आपदा के बाद हमने केवल डेढ़ वर्ष के भीतर पुनर्निर्माण और पुनर्वास कार्यों को गति दी। राज्य की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाया गया, और केंद्र सरकार से आपदा मानकों में सुधार भी करवाया गया।”

रावत ने स्पष्ट किया कि उन्हीं के शासनकाल में SDRF का गठन, एक व्यापक SOP की रचना, और जनपदों में आपदा प्रबंधन सेल का सशक्तिकरण हुआ। उन्होंने दावा किया कि उनके कार्यकाल में चारधाम यात्रा, कांवड़ यात्रा, नंदा राजजात यात्रा और हरिद्वार अर्धकुंभ जैसे आयोजन बिना किसी बड़ी दुर्घटना के सफलतापूर्वक आयोजित किए गए।

उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में यह भी पूछा कि अगर कुछ पूर्व मुख्यमंत्रियों ने राजनीति से संन्यास ले लिया है, तो इसकी जानकारी सिर्फ धस्माना को ही क्यों है?

सूर्यकांत धस्माना द्वारा उठाए गए सवाल उत्तराखंड की राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था को आईना दिखाते हैं। वहीं, हरीश रावत का जवाब यह संकेत देता है कि कम से कम उनके कार्यकाल में कुछ ठोस प्रयास जरूर हुए। अब बारी वर्तमान नेतृत्व की है कि वो इन सवालों का जवाब न केवल शब्दों में दे, बल्कि मैदान में उतरकर जवाबदेही और व्यवस्था दोनों को मजबूत करें।

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