नई दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर में आयोजित आरएसएस के कार्यक्रम में धर्म, समाज और राष्ट्र की भूमिका पर विस्तार से विचार रखे। आरएसएस के शताब्दी वर्ष के अवसर पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित अवधारणा नहीं है, बल्कि वही पूरे ब्रह्मांड और समाज को संचालित करने वाला मूल सिद्धांत है।
भागवत ने कहा कि सृष्टि के अस्तित्व में आने के साथ ही उसके संचालन के जो नियम बने, वही धर्म कहलाए। व्यक्ति से लेकर समाज और राष्ट्र तक, सब कुछ इन्हीं नियमों पर आधारित है। उन्होंने कहा कि जब तक भारत का मार्गदर्शन इस व्यापक अर्थ वाले धर्म से होता रहेगा, तब तक वह विश्व को दिशा देने की क्षमता बनाए रखेगा।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि धर्मनिरपेक्षता राज्य की व्यवस्था हो सकती है, लेकिन कोई भी व्यक्ति या सामाजिक संरचना धर्म के बिना नहीं चल सकती। दुनिया में आध्यात्मिक मूल्यों की कमी के कारण ही कई जगह संतुलन और दिशा का अभाव दिखाई देता है।
जाति व्यवस्था पर चिंता व्यक्त करते हुए सरसंघचालक ने कहा कि समाज से जातिगत भेदभाव समाप्त करने के लिए सबसे पहले मन से जाति की भावना को खत्म करना होगा। उन्होंने कहा कि प्रारंभ में जाति कार्य और दायित्व से जुड़ी थी, लेकिन समय के साथ यह विभाजन और भेदभाव का कारण बन गई, जिसे समाप्त करना आवश्यक है।
आरएसएस की भूमिका पर बोलते हुए भागवत ने कहा कि संघ का उद्देश्य किसी से प्रतिस्पर्धा करना नहीं है, बल्कि समाज के साथ मिलकर भारत को उसके सर्वोच्च गौरव तक पहुंचाना है। संघ व्यक्ति के चरित्र निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण का कार्य करता है। उन्होंने कहा कि संघ स्वयं को बड़ा बनाने की नहीं, बल्कि पूरे समाज को आगे बढ़ाने की सोच रखता है।
उन्होंने यह भी कहा कि जो लोग आरएसएस को सही मायनों में समझना चाहते हैं, उन्हें उसकी शाखाओं से जुड़कर संगठन को करीब से जानना चाहिए।
