देहरादून: उत्तराखंड सरकार ने पर्वतीय क्षेत्रों में बिखरी खेती को व्यवस्थित करने और कृषि उत्पादन बढ़ाने के उद्देश्य से स्वैच्छिक-आंशिक चकबंदी प्रोत्साहन नीति लागू करने की पहल की है। हालांकि, पहाड़ की भौगोलिक परिस्थितियां, पुश्तैनी भूमि विवाद और पलायन जैसी समस्याएं इस योजना के सामने बड़ी चुनौती बनकर खड़ी हैं। सरकार अब इन बाधाओं को दूर करने के लिए जिलाधिकारियों के साथ लगातार बैठकों और व्यापक जागरूकता अभियान की तैयारी में जुट गई है।
क्या है चकबंदी?
पर्वतीय क्षेत्रों में खेत छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटे हुए हैं और कई जगह अलग-अलग स्थानों पर फैले हैं। इससे खेती में अधिक श्रम और समय लगता है, जबकि उत्पादन अपेक्षाकृत कम मिलता है। चकबंदी के तहत बिखरी जमीनों को व्यवस्थित कर समान चकों में बदला जाता है और फिर किसानों के बीच उनका पुनर्वितरण किया जाता है।
उत्तराखंड में फिलहाल हरिद्वार और ऊधम सिंह नगर जिलों में ही व्यवस्थित चकबंदी व्यवस्था लागू है। अब सरकार 11 पर्वतीय जिलों में इसे बढ़ावा देने की तैयारी कर रही है।
पहाड़ में क्यों कठिन है चकबंदी?
गोल खातों की उलझन
पर्वतीय क्षेत्रों में अधिकांश जमीनें पुश्तैनी संयुक्त खातों में दर्ज हैं, जिन्हें गोल खाते कहा जाता है। एक ही खाते में कई-कई हिस्सेदार दर्ज हैं। ऐसे में असली मालिकाना हक तय करना और भूमि का स्पष्ट बंटवारा करना आसान नहीं है।
पलायन सबसे बड़ी चुनौती
राज्य के 1726 गांव पलायन के कारण वीरान हो चुके हैं। बड़ी संख्या में लोग देश-विदेश में बस चुके हैं। स्वैच्छिक चकबंदी के लिए कम से कम 10 हेक्टेयर भूमि या 25 खाताधारकों की लिखित सहमति जरूरी है। ऐसे में प्रवासियों से संपर्क स्थापित करना और उन्हें सहमत करना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती माना जा रहा है।
भूमि की अलग-अलग गुणवत्ता
पहाड़ में कहीं खेत नदी किनारे उपजाऊ हैं तो कहीं पथरीली ढलानों पर स्थित हैं। ऐसे में समान गुणवत्ता और मूल्य वाली जमीन का पुनर्गठन करना बेहद जटिल प्रक्रिया बन जाता है।
पुश्तैनी जमीन से भावनात्मक जुड़ाव
ग्रामीणों का अपनी पुश्तैनी भूमि से गहरा भावनात्मक रिश्ता होता है। कई किसान आशंकित हैं कि चकबंदी के दौरान उपजाऊ जमीन के बदले उन्हें कम उपजाऊ या बंजर भूमि न मिल जाए।
सरकार की रणनीति क्या है?
राज्य सरकार अब इस नीति को गांव-गांव तक पहुंचाने के लिए प्रचार-प्रसार अभियान चलाएगी। जिलाधिकारी अपने-अपने जिलों में भूमि विवाद रहित पांच गांव चिह्नित करेंगे, जहां पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर चकबंदी प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी।
तहसील स्तर पर ग्रामीणों के साथ बैठकें आयोजित होंगी और उनकी समस्याओं का समाधान करने का प्रयास किया जाएगा। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि चकबंदी अपनाने वाले गांवों को प्रोत्साहन राशि और खेतों की घेरबाड़ जैसी योजनाओं का लाभ दिया जाएगा।
फार्मर रजिस्ट्री पर जोर
गोल खातों और भूमि रिकॉर्ड की जटिलताओं को दूर करने के लिए सरकार एग्रीस्टैक योजना के तहत फार्मर रजिस्ट्री का कार्य तेजी से कर रही है। इसके तहत किसानों और उनकी भूमि का डिजिटल एवं प्रमाणित डाटाबेस तैयार किया जा रहा है। अभी तक लगभग 2.30 लाख किसानों की रजिस्ट्री हो चुकी है, जबकि राज्य में किसानों की संख्या करीब नौ लाख बताई जा रही है।
पहले भी सीमित रही चकबंदी
अविभाजित उत्तर प्रदेश के समय वर्ष 1973 में मसूरी के पास सलांग गांव में चकबंदी की गई थी। उत्तराखंड बनने के बाद वर्ष 2012-13 में चमोली जिले के सीमावर्ती घेस गांव में स्वैच्छिक चकबंदी का प्रयोग किया गया, लेकिन इसके बाद यह प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।
कृषि सचिव S. N. Pandey ने कहा कि ग्रामीणों को जागरूक कर उनकी शंकाओं का समाधान किया जाएगा और प्रवासियों से भी संपर्क साधा जाएगा, ताकि चकबंदी की प्रक्रिया को सफल बनाया जा सके।
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