उत्तराखंड में अल्पसंख्यक स्कूलों के लिए धार्मिक पाठ्यक्रम तैयार, अब शासन की मंजूरी का इंतजार

 

 

 

देहरादून: उत्तराखंड में अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के विद्यार्थियों के लिए धार्मिक पाठ्यक्रम तैयार करने की प्रक्रिया एक कदम आगे बढ़ गई है। उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण ने नौवीं से 12वीं कक्षा तक के पाठ्यक्रमों को अंतिम रूप दे दिया है। अब इन्हें अनुमोदन के लिए शासन को भेजा जाएगा।

प्राधिकरण के अध्यक्ष प्रो. सुरजीत सिंह गांधी के अनुसार, मुस्लिम, जैन, सिख, बौद्ध और ईसाई समुदायों के शिक्षाविदों ने अपने-अपने विषयों पर विचार-विमर्श किया। उपसमिति के सदस्यों ने छह धार्मिक भाषा शिक्षा पाठ्यक्रमों को मंजूरी दी है। शासन की स्वीकृति के बाद इन्हें प्राधिकरण से संबद्ध अल्पसंख्यक विद्यालयों में वैकल्पिक व्यवस्था के तहत लागू किया जाएगा।

मुख्यधारा की पढ़ाई अनिवार्य, धार्मिक पाठ्यक्रम वैकल्पिक

प्राधिकरण की योजना के तहत विद्यार्थियों को अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं, दर्शन तथा विरासत को पढ़ने का अवसर मिलेगा। इसके साथ ही सामान्य शिक्षा जारी रहेगी और धार्मिक पाठ्यक्रम चुनना विद्यार्थियों की इच्छा पर निर्भर होगा। कक्षा एक से आठवीं तक के लिए भी धार्मिक पाठ्यक्रम की व्यवस्था का उल्लेख किया गया है।

मदरसा बोर्ड के बाद नई व्यवस्था

धामी सरकार ने 30 जून 2026 को मदरसा बोर्ड समाप्त कर दिया था। इसके बाद एक जुलाई 2026 से उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण ने कामकाज शुरू किया। नई व्यवस्था में अल्पसंख्यक संस्थानों को आधुनिक शिक्षा के लिए शिक्षा विभाग और धार्मिक पाठ्यक्रम के लिए प्राधिकरण से जुड़ना अनिवार्य किया गया है।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, राज्य के 452 मदरसों में से 226 बंद हो चुके हैं। 206 संस्थानों की मान्यता प्रक्रिया चल रही है, जबकि 35 को मान्यता मिल चुकी है।

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