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नेपाल की बाढ़ ने बढ़ाई उत्तराखंड की टेंशन, 13 ग्लेशियर झीलों पर निगरानी का सवाल

photo-nepalekhaber

 

 

 

देहरादून: नेपाल में ग्लेशियर से जुड़ी विनाशकारी बाढ़ ने हिमालयी राज्यों के लिए एक बार फिर खतरे की घंटी बजा दी है। नेपाल की हालिया त्रासदी के बाद उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलों की निगरानी, वैज्ञानिक अध्ययन और समय रहते चेतावनी देने की व्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ गई है। राज्य में चिन्हित 13 संवेदनशील ग्लेशियर झीलें अब आपदा प्रबंधन की तैयारियों के केंद्र में हैं।

नेपाल में 26 अगस्त को आई भीषण बाढ़ ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई। 2 सितंबर तक उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक वहां 1,127 लोगों की मौत और 4,858 से अधिक लोगों के लापता होने की जानकारी सामने आई है। इस घटना ने हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर, झीलों और अचानक आने वाली बाढ़ के खतरे को फिर चर्चा में ला दिया है।

उत्तराखंड में 13 झीलें संवेदनशील

उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलों के जोखिम का आकलन पहले ही किया जा चुका है। NDMA के आकलन में 13 ग्लेशियर झीलों को संवेदनशील श्रेणियों में रखा गया है। इनमें 5 झीलें Category-A, यानी सबसे अधिक जोखिम वाली श्रेणी में हैं। ये झीलें चमोली, पिथौरागढ़, बागेश्वर, टिहरी और उत्तरकाशी जिलों में स्थित हैं।

राज्य में इन संवेदनशील झीलों का वैज्ञानिक अध्ययन और निगरानी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि हिमालयी क्षेत्रों में तापमान, ग्लेशियरों में बदलाव और भारी बारिश जैसी परिस्थितियां झीलों के जलस्तर पर असर डाल सकती हैं।

पांच जिलों पर खास नजर

संवेदनशील ग्लेशियर झीलों के लिहाज से पिथौरागढ़, चमोली, उत्तरकाशी, बागेश्वर और टिहरी महत्वपूर्ण जिले हैं। इनमें वसुधारा, सरस्वती ताल, केदार ताल, नागकुंड, मबांग, प्युनग्रू और स्यूंतियांक्ति जैसी झीलों को लेकर वैज्ञानिक निगरानी और अध्ययन की जरूरत लगातार रेखांकित की जाती रही है।

कुछ संवेदनशील झीलों पर बाथिमेट्रिक और ग्लेशियोलॉजिकल अध्ययन भी किए जा चुके हैं, ताकि उनके आकार, गहराई, जल क्षमता और संभावित जोखिम को बेहतर तरीके से समझा जा सके।

उत्तराखंड में 1200 से ज्यादा ग्लेशियर झीलें

ग्लेशियर झीलों का दायरा सिर्फ इन 13 संवेदनशील झीलों तक सीमित नहीं है। पुराने ग्लेशियर-लेक इन्वेंटरी के अनुसार उत्तराखंड के अलग-अलग नदी बेसिन में 1,266 ग्लेशियर झीलें दर्ज की गई थीं।

इनमें अलकनंदा बेसिन में 635, भागीरथी में 306, गोरी गंगा में 92, धौली गंगा में 75, टोंस में 52, कुटियांगति में 45, यमुना में 13, भीलंगना में 22, मंदाकिनी में 19 और पिंडारी में 7 झीलें शामिल हैं।

जिलेवार पुराने आंकड़ों में चमोली में 192, उत्तरकाशी में 83, पिथौरागढ़ में करीब 40, रुद्रप्रयाग में 11, टिहरी में 10 और बागेश्वर में 8 ग्लेशियर झीलें दर्ज हैं।

2013 की केदारनाथ आपदा की याद भी ताजा

नेपाल की घटना ने उत्तराखंड में 2013 की केदारनाथ आपदा की याद भी ताजा कर दी है। 16-17 जून 2013 को भारी बारिश और चौराबाड़ी ताल से जुड़े घटनाक्रम ने केदारनाथ क्षेत्र में भयावह तबाही मचाई थी। अचानक आए पानी और मलबे ने केदारपुरी को भारी नुकसान पहुंचाया और हजारों लोगों की जान चली गई।

इसी वजह से उत्तराखंड के लिए ग्लेशियर झीलों की निगरानी महज पर्यावरणीय मुद्दा नहीं, बल्कि सीधे तौर पर मानव सुरक्षा और आपदा प्रबंधन से जुड़ा विषय है।

अर्ली वार्निंग सिस्टम को मजबूत करने की जरूरत

नेपाल की त्रासदी के बाद सबसे बड़ा सबक यही है कि हिमालयी क्षेत्रों में सिर्फ आपदा आने के बाद राहत और बचाव की तैयारी पर्याप्त नहीं है। जलस्तर, ग्लेशियर झीलों में बदलाव और संभावित अचानक बाढ़ की पहले से पहचान के लिए रियल टाइम मॉनिटरिंग और प्रभावी अर्ली वार्निंग सिस्टम जरूरी है।

उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में चुनौती और बड़ी है, क्योंकि कई संवेदनशील झीलें बेहद दुर्गम इलाकों में स्थित हैं। ऐसे में सैटेलाइट निगरानी, सेंसर आधारित सिस्टम, नियमित वैज्ञानिक सर्वे और स्थानीय स्तर पर त्वरित चेतावनी तंत्र को आपस में जोड़ना महत्वपूर्ण होगा।

नेपाल की तबाही ने साफ कर दिया है कि हिमालय में खतरा केवल पहाड़ों पर मौजूद नहीं है—कई बार पहाड़ों के बीच जमा पानी भी बड़ी आपदा का कारण बन सकता है। उत्तराखंड के लिए यही समय है कि संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की निगरानी और चेतावनी व्यवस्था को और मजबूत किया जाए।

 
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