भारत में घट रही जन्म दर: 50 साल में पहली बार प्रतिस्थापन स्तर से नीचे पहुंचा TFR, बदल रहा परिवार और समाज का चेहरा

photo ai

 

 

 

 

नई दिल्ली: कभी जनसंख्या विस्फोट को लेकर चिंतित रहने वाला भारत अब एक नए जनसांख्यिकीय मोड़ पर खड़ा है। देश की कुल प्रजनन दर (TFR) वर्ष 2024 में घटकर 1.9 पर पहुंच गई है, जो आबादी को स्थिर बनाए रखने के लिए आवश्यक 2.1 के प्रतिस्थापन स्तर से भी कम है। विशेषज्ञ इसे केवल जनसंख्या का आंकड़ा नहीं, बल्कि भारतीय समाज में तेजी से हो रहे सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक बदलावों का संकेत मान रहे हैं।

पांच दशक में आधी से भी कम हुई जन्म दर

सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) के आंकड़ों के अनुसार भारत में 1971 में प्रति महिला औसतन 5.2 बच्चे जन्म लेते थे। यह आंकड़ा 1985 में 4.3, वर्ष 2005 में 2.9, 2020 में 2.0 और अब 2024 में 1.9 तक पहुंच गया है। अनुमान है कि अगले कुछ वर्षों में यह दर और घटकर 1.6 तक पहुंच सकती है।

महिलाओं की शिक्षा और आत्मनिर्भरता बनी बड़ी वजह

विशेषज्ञों का मानना है कि जन्म दर में गिरावट के पीछे सबसे बड़ा कारण महिलाओं की बढ़ती शिक्षा और आर्थिक भागीदारी है। आज अधिक महिलाएं उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही हैं, रोजगार से जुड़ रही हैं और विवाह व मातृत्व जैसे महत्वपूर्ण निर्णय स्वयं लेने लगी हैं।

आंकड़े बताते हैं कि शिक्षा का स्तर बढ़ने के साथ बच्चों की संख्या घटती है। जहां अशिक्षित महिलाओं की प्रजनन दर 3.2 है, वहीं स्नातक या उससे अधिक शिक्षित महिलाओं में यह आंकड़ा केवल 1.6 है।

देर से शादी और बदली प्राथमिकताएं

भारत में महिलाओं की औसत विवाह आयु बढ़कर 23.1 वर्ष हो चुकी है। पहले जहां 20 से 24 वर्ष की आयु में सबसे अधिक बच्चे जन्म लेते थे, अब यह प्रवृत्ति 25 से 29 वर्ष आयु वर्ग में दिखाई दे रही है। करियर, आर्थिक स्थिरता और बेहतर जीवन स्तर की चाहत ने युवाओं की प्राथमिकताओं को बदल दिया है।

शहरों में छोटे परिवार बन रहे नई सामान्य व्यवस्था

महंगाई, आवास की बढ़ती लागत, बच्चों की शिक्षा पर खर्च और सीमित शहरी संसाधनों के कारण महानगरों और शहरों में छोटे परिवारों का चलन तेजी से बढ़ा है। यही कारण है कि ग्रामीण क्षेत्रों में प्रजनन दर 2.1 बनी हुई है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह घटकर 1.5 रह गई है।

एक या दो बच्चों वाले परिवारों की बढ़ी संख्या

हालिया आंकड़े बताते हैं कि देश में दर्ज कुल जन्मों में दो-तिहाई से अधिक पहले बच्चे के जन्म हैं, जबकि चौथे या उससे अधिक बच्चे वाले जन्म केवल 3.5 प्रतिशत रह गए हैं। इससे स्पष्ट है कि भारतीय समाज तेजी से छोटे परिवारों की ओर बढ़ रहा है।

सकारात्मक बदलाव भी, नई चुनौतियां भी

कम प्रजनन दर ने महिलाओं के स्वास्थ्य, शिक्षा और आर्थिक सशक्तिकरण को बढ़ावा दिया है। परिवार अब कम बच्चों पर अधिक संसाधन और बेहतर अवसर उपलब्ध करा पा रहे हैं।

हालांकि इसके साथ भविष्य में कुछ नई चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार कामकाजी आयु वर्ग की आबादी में कमी, बुजुर्गों की बढ़ती संख्या, स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त दबाव और पेंशन संबंधी जरूरतें आने वाले दशकों में नीति निर्माताओं के लिए बड़ी चुनौती बन सकती हैं।

बदलते भारत की नई तस्वीर

भारत की घटती प्रजनन दर को केवल जनसंख्या में कमी के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, आर्थिक विकास और बदलती जीवनशैली का परिणाम है। छोटे परिवार अब अपवाद नहीं, बल्कि आधुनिक भारत की नई सामाजिक वास्तविकता बनते जा रहे हैं। आने वाले वर्षों में देश को इस बदलाव के अवसरों और चुनौतियों दोनों के लिए तैयार रहना होगा।

 
 
(Visited 1 times, 1 visits today)