‘गॉडजिला अल-नीनो’ की दस्तक! कमजोर पड़ सकता है मानसून, खेती और महंगाई पर मंडराया बड़ा खतरा

 

 

 

 

नई दिल्ली: देश के कई हिस्से भीषण गर्मी की चपेट में हैं और लोग मानसून की राहत भरी बारिश का इंतजार कर रहे हैं। लेकिन इसी बीच मौसम वैज्ञानिकों ने एक ऐसी वैश्विक जलवायु घटना को लेकर चेतावनी दी है, जो भारत के मानसून और कृषि व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है। वैज्ञानिकों के अनुसार प्रशांत महासागर में विकसित हो रहा अल-नीनो इस बार असाधारण रूप से शक्तिशाली हो सकता है, जिसे विशेषज्ञों ने ‘गॉडजिला अल-नीनो’ का नाम दिया है।

मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि प्रशांत महासागर के तापमान में लगातार हो रही वृद्धि के कारण अल-नीनो की स्थिति तेजी से मजबूत हो रही है। अंतरराष्ट्रीय जलवायु एजेंसियों ने इसकी आधिकारिक पुष्टि भी कर दी है और आशंका जताई है कि वर्ष के उत्तरार्ध तक इसका प्रभाव और गहरा सकता है।

क्या है अल-नीनो और क्यों बढ़ी चिंता?

अल-नीनो एक वैश्विक जलवायु प्रक्रिया है, जो प्रशांत महासागर के सतही जल के असामान्य रूप से गर्म होने पर विकसित होती है। सामान्य परिस्थितियों में समुद्री हवाएं गर्म पानी को एशिया की ओर धकेलती हैं, लेकिन अल-नीनो के दौरान ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं। परिणामस्वरूप गर्म जल पूर्वी प्रशांत क्षेत्र में फैल जाता है और दुनिया भर के मौसम चक्र प्रभावित होने लगते हैं।

वैज्ञानिकों के अनुसार मध्य प्रशांत क्षेत्र का तापमान पहले ही अल-नीनो के मानक स्तर से काफी ऊपर पहुंच चुका है। अनुमान है कि आने वाले महीनों में यह और बढ़ सकता है, जिससे वैश्विक मौसम पैटर्न में बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

भारत के लिए क्यों है खतरे की घंटी?

भारत की अर्थव्यवस्था और कृषि काफी हद तक मानसून पर निर्भर है। देश की लगभग 70 प्रतिशत वार्षिक वर्षा मानसून से होती है, जबकि करोड़ों किसान खेती के लिए इसी बारिश पर भरोसा करते हैं। अल-नीनो के प्रभाव से मानसूनी हवाओं की ताकत कमजोर पड़ सकती है, जिससे सामान्य से कम बारिश होने की आशंका बढ़ जाती है।

मौसम विभाग ने भी इस वर्ष औसत से कम वर्षा होने की संभावना जताई है। यदि मानसून कमजोर रहा तो इसका सीधा असर कृषि उत्पादन, जल भंडारण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

खेती से लेकर रसोई तक पड़ सकता है असर

विशेषज्ञों का कहना है कि कम बारिश का सबसे पहला असर खेतों में दिखाई देता है। पर्याप्त नमी न मिलने से फसलों की पैदावार प्रभावित होती है, जिसका असर बाद में खाद्य पदार्थों की उपलब्धता और कीमतों पर पड़ता है। ऐसे में कमजोर मानसून महंगाई बढ़ाने का कारण भी बन सकता है।

पिछले बड़े अल-नीनो के दौरान देश के कई हिस्सों में वर्षा सामान्य से काफी कम रही थी, जिससे सूखे जैसी परिस्थितियां पैदा हुई थीं। यही वजह है कि इस बार भी मौसम वैज्ञानिक और कृषि विशेषज्ञ अल-नीनो की गतिविधियों पर लगातार नजर बनाए हुए हैं।

मानसून पर टिकी करोड़ों लोगों की उम्मीदें

भीषण गर्मी से जूझ रहे देश के लिए मानसून सिर्फ राहत का मौसम नहीं, बल्कि कृषि, जल संसाधन और खाद्य सुरक्षा की जीवनरेखा है। ऐसे में ‘गॉडजिला अल-नीनो’ की आशंका ने किसानों, नीति निर्माताओं और आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। आने वाले कुछ महीने यह तय करेंगे कि मानसून इस चुनौती का कितना सामना कर पाता है और देश पर इसका कितना प्रभाव पड़ता है।

 
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