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‘हिंदू होने के लिए मंदिर जाना जरूरी नहीं’, सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से छिड़ी नई बहस

 

 

 

नई दिल्ली: Supreme Court of India ने हिंदुत्व और धार्मिक आस्था को लेकर सुनवाई के दौरान अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि हिंदू बने रहने के लिए किसी व्यक्ति का मंदिर जाना या धार्मिक कर्मकांड करना अनिवार्य नहीं है। अदालत ने कहा कि आस्था केवल पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं होती और घर में दीपक जलाना भी धार्मिक विश्वास का प्रतीक हो सकता है।

प्रधान न्यायाधीश Surya Kant की अध्यक्षता वाली नौ जजों की संविधान पीठ धार्मिक स्वतंत्रता और विभिन्न धार्मिक परंपराओं से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही है। इनमें Sabarimala Temple में महिलाओं के प्रवेश से जुड़ा विवाद और Dawoodi Bohra Community समेत अन्य समुदायों की धार्मिक प्रथाओं से संबंधित याचिकाएं शामिल हैं।

‘हिंदुत्व एक जीवन शैली’

सुनवाई के दौरान हस्तक्षेपकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता G Mohan Gopal ने तर्क दिया कि हिंदुत्व को पहले धार्मिक श्रेणी के रूप में देखा गया था और 1966 के एक फैसले में हिंदू की परिभाषा वेदों को सर्वोच्च मानने वाले व्यक्ति के रूप में की गई थी। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या आज हर हिंदू वास्तव में वेदों को सर्वोच्च मानता है।

इस पर संविधान पीठ की सदस्य BV Nagarathna ने कहा कि यही कारण है कि हिंदुत्व को “जीवन शैली” के रूप में देखा जाता है। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति के लिए कर्मकांड या मंदिर जाना आवश्यक नहीं है और किसी को भी अपने तरीके से धर्म का पालन करने से रोका नहीं जा सकता।

दीपक जलाना भी आस्था का प्रतीक

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपनी झोपड़ी में दीपक जलाता है, तो वह भी उसके धार्मिक विश्वास को दर्शाने के लिए पर्याप्त है।

अदालत ने पहले भी जताई थी चिंता

सुप्रीम कोर्ट इससे पहले भी टिप्पणी कर चुका है कि यदि हर धार्मिक प्रथा और परंपरा को संवैधानिक अदालतों में चुनौती दी जाने लगे, तो इससे न्यायालयों पर बोझ बढ़ेगा और धर्म से जुड़े विवाद लगातार गहराते जाएंगे। मामले की सुनवाई फिलहाल जारी है।

 
 
 
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