देहरादून: मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा राजकीय दून मेडिकल कॉलेज चिकित्सालय में जनसुविधाएं बढ़ाने के निर्देश दिए जाने के बावजूद अस्पताल में मौजूदा व्यवस्थाओं की पहले की गंभीर कमियां उजागर हो रही हैं। मुख्यमंत्री के औचक निरीक्षण के बाद 48 घंटे में वेटिंग एरिया में पंखे, मास्क और सैनिटाइजर की व्यवस्था तो की गई, लेकिन इससे पहले दशकों से मरीजों और तीमारदारों को असुविधाओं का सामना करना पड़ता रहा।
तीमारदारों ने आक्रोश व्यक्त किया कि उन्हें लंबे समय से अस्पताल परिसर में ही बैठकर या यहां तक कि रात बिताकर मरीजों की देखभाल करनी पड़ती है, जबकि मूलभूत जनसुविधाओं की व्यवस्था अत्यंत दयनीय स्थिति में थी। पंखे, पेयजल, पर्याप्त बैठने की व्यवस्था, मास्क और सैनिटाइजर का अभाव सामान्य था। अस्पताल की साफ-सफाई पर भी लंबे समय से ध्यान नहीं दिया गया था, जिससे संक्रमण का खतरा बना रहता था।
एक तीमारदार ने कहा,
“हम कई बार अस्पताल में ही रात बिताने को मजबूर होते हैं। गर्मी में उमस और गंदगी के बीच पंखे, साफ सफाई और सुरक्षा का अभाव बेहद परेशान करता था। मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद तो व्यवस्था थोड़ी सुधरी है, लेकिन यह अस्थायी समाधान से अधिक कुछ नहीं।”
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निरीक्षण के बाद सैकड़ों शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई की गई, लेकिन यह सवाल उठता है कि क्या पहले से ही ऐसी जरूरी व्यवस्थाएं होना आवश्यक नहीं था? क्या प्रशासन वर्षों से मरीजों और तीमारदारों की मूलभूत जरूरतों को अनदेखा कर रहा था?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम स्वागत योग्य जरूर है, लेकिन इससे पहले स्वास्थ्य संस्थानों में मूलभूत सुविधाओं की पूर्ण व्यवस्था का होना प्राथमिकता होनी चाहिए थी।
“यह दिखावे की कार्यवाही नहीं होनी चाहिए, बल्कि नियमित और सतत सुधार की नीति अपनाई जानी चाहिए ताकि अस्पताल सेवाएं लंबे समय तक बेहतर बनी रहें।”
प्रदेश के अन्य अस्पतालों में भी इसी तरह की व्यवस्थाओं की स्थिति जांचने की आवश्यकता है। यदि दून अस्पताल जैसी स्थिति सामान्य बन गई है, तो लाखों मरीज और तीमारदार इसी असुविधा का सामना कर रहे होंगे।
यह स्पष्ट है कि प्रशासनिक रूप से किए जा रहे सुधार तत्काल राहत तो देते हैं, लेकिन असली समाधान के लिए एक ठोस और दीर्घकालिक नीति बनाना अत्यंत आवश्यक है, ताकि स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में व्याप्त कमियां स्थायी रूप से समाप्त हो सकें।
