‘नकटी’ बाघिन की जिंदगी पर बनी डॉक्यूमेंट्री, जंगल में जख्म से जंग और शावकों से पुनर्मिलन की मार्मिक कहानी”

photo- etvbharat

 

 

 

रामनगर (उत्तराखंड): जंगल की नमी, बाघिन की ममता और एक विभाग की चौकस निगाहें—इन तीनों ने मिलकर एक ऐसी कहानी रच दी है, जो वन्यजीव संरक्षण के इतिहास में एक मिसाल बन गई है। उत्तराखंड के रामनगर स्थित फाटो रेंज से आई इस मार्मिक गाथा की नायिका है ‘नकटी’—वो बाघिन, जिसने घायल अवस्था में भी अपने शावकों को न छोड़ा और जिसने इंसानियत से मिले सहारे से दोबारा जीवन की राह पकड़ी।

‘नकटी’ नाम भले ही अटपटा लगे, लेकिन इसके पीछे छुपा है संघर्ष और पहचान का इतिहास। एक समय दूसरे वन्यजीव से संघर्ष में उसकी नाक पर चोट लगने से वह कट गई थी, और तब से वह इसी नाम से जानी जाती है।

कांटे का ज़ख्म और ममता की परीक्षा

मई 2025 में नकटी के पैर में कांटा चुभने से वह चलने-फिरने में असमर्थ हो गई थी। शिकार करना बंद, शरीर में कमजोरी—पर एक मां ने अपने शावकों का साथ नहीं छोड़ा। जंगल की चुप्पी में उसकी दहाड़ें गूंजतीं, लेकिन वो बच्चों को चाटती रही, उन्हें छोड़ने को तैयार नहीं थी।

रेस्क्यू ऑपरेशन बना मिसाल

वन विभाग की सतर्क गश्ती टीम ने जब नकटी की हालत देखी तो तत्परता दिखाई। 2 मई को कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के वरिष्ठ पशु चिकित्सक डॉ. दुष्यंत शर्मा की देखरेख में उसे रेस्क्यू कर ढेला रेंज लाया गया। उधर, उसके दोनों शावकों को उसी क्षेत्र में भोजन मुहैया कराया गया, ताकि मां की गैरमौजूदगी में वे सुरक्षित रहें।

पुनर्मिलन: जंगल की सबसे भावुक दास्तां

सप्ताह भर के इलाज के बाद जब नकटी जंगल में वापस छोड़ी गई तो उसने सबसे पहले अपने बच्चों को ढूंढना शुरू किया। जब तीनों मिले—तो वह दृश्य केवल एक पुनर्मिलन नहीं, बल्कि ममता, संघर्ष और सफलता की कहानी बन गया।

डॉक्यूमेंट्री: जंगल से राष्ट्रीय मंच तक

अब नकटी की यह कहानी चार मिनट की लघु फिल्म के रूप में राष्ट्रीय मंच तक पहुंचेगी। तराई पश्चिमी वन प्रभाग के डीएफओ प्रकाश चंद्र आर्य के अनुसार, यह डॉक्यूमेंट्री वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में मानवीय प्रयासों को उजागर करेगी और लोगों को यह समझाने में मदद करेगी कि पर्यटन और संरक्षण एक साथ कैसे चल सकते हैं।

वन्यजीव प्रेमियों की राय

वन्यजीव प्रेमी राजेश भट्ट का मानना है कि नकटी की कहानी न केवल एक बाघिन की जिंदगी का दस्तावेज है, बल्कि यह दिखाती है कि विभाग जब संवेदनशीलता और तत्परता से काम करता है, तो प्रकृति का संरक्षण भी संभव होता है।

रामनगर की फाटो रेंज से उठी यह कहानी अब जंगल प्रेमियों, प्रकृति रक्षकों और पर्यटकों के बीच एक प्रेरक प्रतीक बनकर उभरेगी। नकटी की ममता और वन विभाग की मानवीयता अब लघु फिल्म के जरिए देश-दुनिया को यह संदेश देगी—कि जंगल सिर्फ दहशत नहीं, ममता भी सहेजते हैं।

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