नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने बागेश्वर जिले के कांडा तहसील में अवैध खड़िया खनन और उसके कारण गांवों में आई दरारों के मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए गंभीर रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश जी. नरेंद्र और न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की खंडपीठ ने भूजल और भूगर्भीय विभागों को 13 जून तक रिपोर्ट दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा – “हमें आम नागरिकों की चिंता है”।
क्या है मामला?
कांडा क्षेत्र के ग्रामीणों ने हाईकोर्ट को पत्र भेजकर बताया था कि अवैध खनन से उनकी खेती, घर और जलस्रोत तबाह हो चुके हैं। धनाढ्य लोग पहले ही गांव छोड़ चुके हैं और जो गरीब रह गए हैं, वे अब अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
गड्ढों में पानी भर चुका है, मशीनें-वाहन बंद पड़े हैं और मानसून से पहले ही आपदा के संकेत दिखने लगे हैं।
कोर्ट ने कहा कि यदि समय रहते इन खतरनाक स्थलों की सफाई और जांच नहीं की गई, तो मानसून के दौरान बड़ा हादसा हो सकता है। इसलिए केंद्रीय एजेंसियों को मौके पर जाकर निरीक्षण कर जल्द रिपोर्ट दाखिल करने को कहा गया है।
नदी-नालों पर अतिक्रमण और अवैध निर्माण पर भी कोर्ट सख्त
इसी सुनवाई में कोर्ट ने देहरादून की नदियों, गधेरों और पर्यावरणीय संकट पर दाखिल तीन जनहित याचिकाओं की भी संयुक्त सुनवाई की। सहस्त्रधारा, बिंदाल और ऋषिपर्णा नदी के किनारे हुए अवैध निर्माण और अतिक्रमण पर चिंता जताई गई।
राज्य सरकार ने कोर्ट को अवगत कराया कि 30 जून तक बिंदाल नदी से अतिक्रमण हटाया जाएगा, और दो चिन्हित स्थलों पर कार्रवाई शुरू हो चुकी है।
कोर्ट के निर्देश:
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सभी अतिक्रमित जलधाराओं पर सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं।
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संबंधित एसएचओ अतिक्रमणकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करें।
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शहरी विकास सचिव जनजागरूकता अभियान चलाएं कि नदियों में अवैध खनन और मलवा न फेंका जाए।
क्या कहते हैं याचिकाकर्ता?
सहस्त्रधारा निवासी अजय नारायण शर्मा, रेनू पाल और उर्मिला थापर ने कोर्ट में कहा कि जलमग्न भूमि पर अत्यधिक निर्माण से जल स्रोत सूख रहे हैं, पर्यावरण को खतरा बढ़ रहा है। ऋषिकेश, नालों और ढांगों पर बेतहाशा अतिक्रमण हो चुका है, जिससे मानसून में बाढ़ और भू-स्खलन का जोखिम कई गुना बढ़ सकता है।
हाईकोर्ट का यह सख्त रुख एक महत्वपूर्ण चेतावनी है – खनन और अतिक्रमण की अनदेखी अब नहीं चलेगी। जहां एक ओर पहाड़ों की दरकती ज़मीन ग्रामीणों का भविष्य निगल रही है, वहीं शहरों की नदियों में अवैध निर्माण पर्यावरण संकट को जन्म दे रहे हैं। समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाला मानसून त्रासदी बन सकता है।