देहरादून: उत्तराखंड इन्फ्रास्ट्रक्चर एंड इन्वेस्टमेंट डेवलपमेंट बोर्ड (यूआईआईडीबी) को लेकर 7,000 बीघा सरकारी भूमि दिए जाने के आरोपों के बीच राज्य सरकार ने स्थिति स्पष्ट की है। सरकार का कहना है कि यूआईआईडीबी को 7,000 बीघा भूमि आवंटित किए जाने की बात तथ्यात्मक रूप से गलत है। अब तक बोर्ड को चिन्हित भूमि में से केवल 45 एकड़ भूमि ही उपलब्ध हो पाई है। सरकार के अनुसार इतनी बड़ी मात्रा में भूमि हासिल करने की कोई प्रक्रिया भी फिलहाल संचालित नहीं है।
प्रमुख सचिव नियोजन एवं यूआईआईडीबी के प्रबंध निदेशक आर. मीनाक्षी सुंदरम ने कहा कि बोर्ड की गतिविधियों को लेकर सार्वजनिक मंचों पर उठ रहे सवालों के बीच वास्तविक स्थिति सामने रखना जरूरी है, ताकि भूमि आवंटन को लेकर किसी तरह का भ्रम न रहे।
भूमि बेचने के बजाय लीज मॉडल पर जोर
सरकार ने स्पष्ट किया है कि यूआईआईडीबी के माध्यम से सरकारी जमीन का स्वामित्व निजी संस्थाओं को हस्तांतरित नहीं किया जाएगा। निवेश परियोजनाओं के लिए भूमि का इस्तेमाल निर्धारित नियमों के तहत लीज मॉडल से किया जाएगा। सरकार के मुताबिक लीज की अवधि 60 वर्ष है, जबकि 90 वर्ष की लीज की बात गलत तरीके से प्रचारित की जा रही है।
बोर्ड के जरिए ऐसी सरकारी भूमि को आर्थिक गतिविधियों में इस्तेमाल करने की योजना है, जो फिलहाल अनुपयोगी पड़ी है। इसके लिए पर्यटन, हॉस्पिटैलिटी, वेलनेस, शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य सेवा क्षेत्रों में निवेश को प्राथमिकता देने की बात कही गई है।
क्यों बनाया गया यूआईआईडीबी?
सरकार के मुताबिक यूआईआईडीबी का मूल उद्देश्य राज्य में पूंजी निवेश बढ़ाना, रोजगार के अवसर पैदा करना और निवेश परियोजनाओं के लिए जरूरी संसाधन उपलब्ध कराना है। राज्य में आयोजित इन्वेस्टर समिट के दौरान मिले निवेश प्रस्तावों को धरातल पर उतारने के लिए उपयुक्त भूमि और आधारभूत सुविधाओं की जरूरत है।
औद्योगिक और विनिर्माण क्षेत्र में सिडकुल पहले से काम कर रहा है। वहीं यूआईआईडीबी को मुख्य रूप से सेवा क्षेत्र के बड़े निवेश को सुगम बनाने वाली व्यवस्था के रूप में विकसित किया जा रहा है।
पर्यटन से शिक्षा तक निवेश पर फोकस
यूआईआईडीबी के जरिए पर्यटन और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में होटल, रिसॉर्ट, वेलनेस सेंटर और अन्य सुविधाओं के विकास को बढ़ावा देने की योजना है। सरकार का कहना है कि उत्तराखंड को बड़े पर्यटन और वेडिंग डेस्टिनेशन के रूप में विकसित करने से स्थानीय परिवहन, होटल, होम स्टे, हस्तशिल्प और स्थानीय उत्पादों से जुड़े कारोबार को भी फायदा मिल सकता है।
इसी तरह उच्च शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बड़े निवेश को आकर्षित करने की योजना है। सरकार का तर्क है कि राज्य में गुणवत्तापूर्ण संस्थानों का विस्तार होने से युवाओं को पढ़ाई के लिए दूसरे बड़े शहरों की ओर कम जाना पड़ेगा और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे।
सरकारी जमीन के लिए लैंड बैंक की तैयारी
प्रमुख सचिव के मुताबिक पर्वतीय राज्य में बड़े निवेश के लिए उपयुक्त भूमि उपलब्ध कराना बड़ी चुनौती है। ऐसे में सरकारी भूमि का व्यवस्थित लैंड बैंक तैयार करने की जरूरत है। हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि इसका मतलब सरकारी जमीन का अनियंत्रित हस्तांतरण या बिक्री नहीं है।
उपलब्ध भूमि का चिन्हीकरण और उपयोग संबंधित कानूनों, नियमों तथा पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप किया जाएगा।
यूआईआईडीबी और लैंड यूज कमेटी अलग-अलग
सरकार ने यूआईआईडीबी को वर्ष 2022 में गठित ऑप्टिमल लैंड यूटिलाइजेशन कमेटी से जोड़कर देखने को भी गलत बताया है। अधिकारियों के अनुसार दोनों व्यवस्थाओं का गठन अलग उद्देश्यों के लिए हुआ है।
लैंड यूटिलाइजेशन कमेटी का उद्देश्य मुख्य रूप से सरकारी विभागों के बीच भूमि हस्तांतरण की प्रक्रियागत दिक्कतों को दूर करना था, जबकि यूआईआईडीबी सेवा क्षेत्र में निवेश और उपलब्ध संसाधनों के बेहतर उपयोग पर केंद्रित है।
भाजपा ने कांग्रेस पर साधा था निशाना
इससे पहले भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने कांग्रेस के 7,000 बीघा भूमि यूआईआईडीबी को दिए जाने के आरोपों को खारिज करते हुए इसे चुनावी दुष्प्रचार बताया था। उनका कहना था कि यूआईआईडीबी के पास फिलहाल बेहद सीमित भूमि है और राज्य में अनुपयोगी सरकारी भूमि का इस्तेमाल रोजगार तथा निवेश बढ़ाने के लिए किया जाना है।
भट्ट ने कांग्रेस पर पिछली सरकारों में औद्योगिक और विकास परियोजनाओं के लिए भूमि आवंटन को लेकर सवाल भी उठाए थे। उन्होंने कहा था कि उत्तराखंड में निवेश लाने के लिए संसाधन उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है।
सरकार का दावा- 45 एकड़ ही उपलब्ध
सरकार की ओर से जारी स्पष्टीकरण में फिलहाल सबसे अहम तथ्य यही है कि 7,000 बीघा भूमि यूआईआईडीबी को नहीं दी गई है और बोर्ड के पास अब तक केवल 45 एकड़ भूमि उपलब्ध हुई है। सरकार के मुताबिक भूमि का इस्तेमाल राज्य का स्वामित्व बरकरार रखते हुए लीज मॉडल पर किया जाएगा।
यूआईआईडीबी के जरिए निवेश बढ़ाने और रोजगार पैदा करने की सरकार की योजना पर राजनीतिक बहस के बीच अब भूमि की वास्तविक मात्रा को लेकर तस्वीर साफ करने की कोशिश की गई है।
