नई दिल्ली: दिल्ली आबकारी मामले में केंद्रीय जांच एजेंसियों की कार्रवाई को लेकर नई बहस छिड़ गई है। सूत्रों और पूर्व अधिकारियों के हवाले से सामने आ रही जानकारी के अनुसार, मामले में Central Bureau of Investigation (CBI) की जांच की दिशा पर सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोप है कि भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत सरकारी पद के दुरुपयोग के ठोस साक्ष्य जुटाने के बजाय जांच का फोकस मनी लॉन्ड्रिंग और मनी ट्रेल की ओर अधिक केंद्रित रहा।
सीबीआई और ईडी की जांच का दायरा अलग
इस प्रकरण में जहां सीबीआई भ्रष्टाचार के पहलुओं की जांच कर रही थी, वहीं Enforcement Directorate (ED) कथित मनी लॉन्ड्रिंग की पड़ताल कर रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि दोनों एजेंसियों के कानूनी दायरे और जांच की प्रकृति अलग-अलग होते हैं, ऐसे में चार्जशीट में स्पष्ट अंतर अपेक्षित था।
भ्रष्टाचार निरोधक कानून की धारा 17 के तहत यदि कोई सरकारी अधिकारी अपने पद का दुरुपयोग कर किसी को लाभ पहुंचाने का प्रयास करता है और उसके प्रमाण उपलब्ध हों, तो दंड का प्रावधान है। कानून में धन के प्रत्यक्ष लेन-देन का प्रमाण अनिवार्य शर्त नहीं माना गया है।
अदालत के आदेश में उठे प्रश्न
राउज एवेन्यू की विशेष अदालत के विस्तृत आदेश में कथित रूप से यह उल्लेख किया गया कि पद के दुरुपयोग के पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए। साथ ही, थोक बिक्रेताओं को दिए गए 12 प्रतिशत कमीशन में से छह प्रतिशत कथित रूप से एक राजनीतिक दल या उसके पदाधिकारियों तक पहुंचने के आरोपों को भी ठोस रूप से स्थापित नहीं किया जा सका।
क्या ईडी का मामला मजबूत रहेगा?
कानूनी हलकों में यह भी चर्चा है कि यदि ट्रायल आगे बढ़ता है तो ईडी मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों को लेकर अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में हो सकती है। गोवा चुनाव से जुड़े कथित धन प्रवाह के साक्ष्य ईडी के आरोपों को समर्थन दे सकते हैं, हालांकि भ्रष्टाचार के मूल आरोपों के संदर्भ में उन्हें पर्याप्त नहीं माना जा रहा।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भ्रष्टाचार के मूल बिंदुओं पर अधिक सुसंगत और स्वतंत्र जांच की जाती, तो चार्जशीट की न्यायिक समीक्षा का परिणाम भिन्न हो सकता था।
