नफरत की आग में झुलसते युवा, कब रुकेगा खून का यह सिलसिला?

 

 

 

TMP: धर्म, पहचान और ‘लव जिहाद’ जैसे मुद्दों पर टीवी चैनलों में होने वाली गरमागरम बहसें अक्सर सुर्खियां तो बटोर लेती हैं, लेकिन इनका असर समाज की जमीनी हकीकत पर भी दिखाई देने लगा है। राजनीतिक और वैचारिक लड़ाइयों के बीच आम लोग, खासकर युवा, सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।

दिल्ली में होली के दिन हुई तरुण की हत्या और हाल ही में गाजियाबाद के खोड़ा क्षेत्र में 17 वर्षीय सूर्या चौहान की हत्या ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पुलिस जांच अपने स्तर पर चल रही है और आरोपियों पर कार्रवाई भी हुई है, लेकिन क्या केवल कानूनी कार्रवाई से समस्या का समाधान हो जाएगा?

असल चिंता इस बात की है कि छोटे विवाद अब इतनी आसानी से हिंसा और हत्या में क्यों बदल रहे हैं। आखिर युवाओं के भीतर बढ़ती आक्रामकता और असहिष्णुता की वजह क्या है? क्या लगातार बढ़ती सामाजिक और वैचारिक कटुता इसके पीछे एक बड़ा कारण है?

हर बड़ी घटना के बाद सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक मंचों तक आक्रोश दिखाई देता है। बयान आते हैं, आरोप-प्रत्यारोप होते हैं और फिर कुछ दिनों बाद मामला चर्चा से बाहर हो जाता है। लेकिन जिन परिवारों ने अपने बेटे खोए हैं, उनके लिए यह दर्द कभी खत्म नहीं होता।

समाज के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हम केवल घटनाओं पर प्रतिक्रिया देते रहेंगे या उनकी जड़ों तक पहुंचने की कोशिश भी करेंगे? नफरत और अविश्वास का माहौल किसी एक समुदाय, वर्ग या व्यक्ति को नहीं, बल्कि पूरे समाज को नुकसान पहुंचाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि परिवार, समाज, शिक्षा व्यवस्था, मीडिया और राजनीतिक नेतृत्व सभी की जिम्मेदारी है कि युवाओं को संवाद, सहिष्णुता और कानून के प्रति सम्मान का संदेश दिया जाए। यदि समाज समय रहते आत्ममंथन नहीं करता, तो ऐसी घटनाएं केवल आंकड़ों में नहीं, बल्कि सामाजिक ताने-बाने में गहरे घाव छोड़ती रहेंगी।

तरुण और सूर्या जैसे नाम केवल खबरें नहीं हैं, बल्कि एक चेतावनी हैं कि नफरत की राजनीति और सामाजिक ध्रुवीकरण का सबसे बड़ा नुकसान आने वाली पीढ़ियां भुगत सकती हैं। इसलिए अब जरूरत केवल बहस की नहीं, बल्कि समाधान खोजने की है।

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