TMP : 30 सितंबर 2026 को इराक में एक लंबा सैन्य अध्याय खत्म हो गया। अमेरिकी नेतृत्व वाले गठबंधन ने देश से अपनी अंतिम सैन्य मौजूदगी भी हटा ली और ‘ऑपरेशन इनहेरेंट रिजॉल्व’ का इराकी मिशन औपचारिक रूप से समाप्त हो गया। 2014 में ISIS के खिलाफ शुरू हुए इस अभियान के बाद अब सुरक्षा की प्राथमिक जिम्मेदारी पूरी तरह इराकी संस्थाओं के सामने है।
इराकी प्रधानमंत्री अली अल-जैदी ने इस बदलाव को देश की संप्रभुता के नए चरण के रूप में पेश किया है। दूसरी तरफ अमेरिका का कहना है कि इराकी सुरक्षा बल और कुर्द पेशमर्गा अब देश के सामने मौजूद खतरों से निपटने की पर्याप्त क्षमता रखते हैं। लेकिन अमेरिकी सैनिकों की विदाई के साथ एक नया सवाल खड़ा हो गया है—क्या इराक अपनी सुरक्षा व्यवस्था को बिना अमेरिकी सैन्य छतरी के स्थिर रख पाएगा?
2014 में ISIS के खिलाफ शुरू हुई थी जंग
2014 में ISIS ने इराक और सीरिया के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया था। मोसुल समेत कई इलाकों पर संगठन के नियंत्रण के बाद अमेरिका के नेतृत्व में अंतरराष्ट्रीय गठबंधन ने उसके खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया। समय के साथ ISIS का क्षेत्रीय कब्जा खत्म हुआ और इराकी सुरक्षा बलों ने अपने नियंत्रण वाले इलाकों का दायरा बढ़ाया। अमेरिकी अधिकारियों का मौजूदा आकलन है कि ISIS अब इराक के लिए पहले जैसी व्यापक राष्ट्रीय सुरक्षा चुनौती नहीं है।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि संगठन पूरी तरह समाप्त हो चुका है। उसके बचे नेटवर्क और स्लीपर सेल अभी भी सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती बने हुए हैं। अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद इन्हें नियंत्रित रखने की जिम्मेदारी अब इराक पर ज्यादा सीधे तौर पर होगी।
अमेरिका गया, लेकिन सुरक्षा सहयोग पूरी तरह खत्म नहीं
इराक से सैन्य वापसी के बावजूद वॉशिंगटन और बगदाद के रिश्ते खत्म नहीं हो रहे हैं। दोनों देशों के बीच सुरक्षा सहयोग का स्वरूप बदल रहा है। अमेरिका अब इराक में बड़े सैन्य मिशन के बजाय प्रशिक्षण और खुफिया सहयोग जैसे सीमित क्षेत्रों में भूमिका बनाए रखने की बात कर रहा है। वहीं ISIS के खिलाफ सीरिया में अमेरिकी नेतृत्व वाली गतिविधियां जारी रहेंगी और संबंधित ऑपरेशनल ढांचा जॉर्डन से संचालित होगा। यानी इराक से अमेरिकी सैन्य मौजूदगी खत्म हुई है, लेकिन अमेरिका की क्षेत्रीय सुरक्षा भूमिका पूरी तरह खत्म नहीं हुई।
पहली बड़ी चुनौती- ISIS के बचे नेटवर्क
इराक में ISIS का क्षेत्रीय शासन खत्म हो चुका है, लेकिन संगठन के बचे हुए लड़ाके और भूमिगत नेटवर्क पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। अमेरिकी सेना की मौजूदगी के दौरान इराकी बलों को प्रशिक्षण, खुफिया जानकारी और सैन्य सहायता मिलती रही। अब बगदाद को खुद यह क्षमता बनाए रखनी होगी।
खास चिंता उत्तरी और विवादित इलाकों को लेकर है, जहां सुरक्षा बलों के बीच समन्वय और ISIS के बचे नेटवर्क दोनों चुनौती बन सकते हैं।
दूसरी चुनौती- हथियारबंद मिलिशिया
अमेरिकी वापसी के बाद इराक की सबसे जटिल घरेलू समस्या हथियारबंद मिलिशिया गुटों को लेकर है। सरकार चाहती है कि देश में हथियारों पर अंतिम नियंत्रण राज्य का हो। इसके लिए मिलिशिया गुटों को हथियार सरकारी नियंत्रण में लाने की प्रक्रिया शुरू की गई है।
लेकिन सभी संगठन इसके लिए तैयार नहीं हैं। कताइब हिजबुल्लाह और हरकत अल-नुजाबा जैसे प्रभावशाली गुटों ने हथियार छोड़ने की प्रक्रिया का विरोध किया है। सरकार ने इसी वजह से मिलिशिया निरस्त्रीकरण की अंतिम समयसीमा को बढ़ाकर 30 जून 2027 कर दिया है।
इससे साफ है कि अमेरिकी सैनिकों की वापसी के साथ ही इराक में राज्य बनाम गैर-राज्य हथियारबंद ताकतों का सवाल और महत्वपूर्ण हो गया है।
तीसरी चुनौती- कुर्द क्षेत्र की सुरक्षा
इराक के उत्तरी कुर्दिस्तान क्षेत्र पर भी अमेरिकी वापसी का असर महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इरबिल एयर बेस से अमेरिकी और गठबंधन बलों की अंतिम विदाई के बाद कुर्द क्षेत्र को अब अपनी सुरक्षा व्यवस्था के लिए बगदाद के साथ ज्यादा तालमेल पर निर्भर रहना होगा।
कुर्द नेतृत्व ने ड्रोन और मिसाइल हमलों से सुरक्षा को लेकर चिंता जताई है। अमेरिकी सुरक्षा मौजूदगी कम होने से क्षेत्र की सुरक्षा, बगदाद-कुर्दिस्तान संबंध और ईरान समर्थित हथियारबंद गुटों की भूमिका पर बहस तेज हो गई है।
क्या ईरान का प्रभाव बढ़ेगा?
अमेरिकी वापसी के बाद इराक की राजनीति में ईरान समर्थित गुटों की भूमिका पर भी नजर है। कई मिलिशिया संगठन इराक की राजनीतिक व्यवस्था का हिस्सा भी हैं। यही वजह है कि हथियारों को राज्य के नियंत्रण में लाने की प्रक्रिया केवल सुरक्षा का मामला नहीं, बल्कि घरेलू राजनीति से भी जुड़ी हुई है।
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिकी मौजूदगी खत्म होने से ईरान समर्थित समूहों का प्रभाव बढ़ सकता है। दूसरी ओर, इराकी सरकार के लिए यही समय यह दिखाने का अवसर भी है कि देश की सुरक्षा और हथियारों पर अंतिम अधिकार राज्य के पास है।
अब अमेरिका-इराक रिश्तों की नई दिशा
अमेरिकी सैनिकों की वापसी को दोनों देशों के रिश्तों का अंत नहीं माना जा रहा। अब संबंधों का फोकस बड़े सैन्य अभियान से हटकर द्विपक्षीय रक्षा सहयोग, प्रशिक्षण, खुफिया साझेदारी और आर्थिक रिश्तों की ओर बढ़ सकता है।
इराक के लिए यह बदलाव संप्रभुता और आत्मनिर्भर सुरक्षा व्यवस्था का दावा करने का मौका है। लेकिन इसके साथ जिम्मेदारी भी बढ़ गई है।
अब बगदाद के सामने तीन सवाल सबसे अहम हैं—ISIS के बचे नेटवर्क को कितना प्रभावी ढंग से रोका जा सकता है, हथियारबंद मिलिशिया को राज्य के नियंत्रण में कैसे लाया जाएगा और कुर्द क्षेत्र समेत पूरे देश में सुरक्षा संतुलन कैसे कायम रखा जाएगा। 30 सितंबर को अमेरिकी मिशन का अंत हो गया। अब इराक के लिए असली परीक्षा शुरू हुई है।

