किशाऊ परियोजना: 1940 में देखा सपना, 86 साल बाद मिली नई रफ्तार

 

 

 

POOJA BARTHWAL : करीब आठ दशक से लंबित किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना को अब आगे बढ़ने का रास्ता मिला है। 15 सितंबर 2026 को उत्तराखंड समेत छह राज्यों ने परियोजना के क्रियान्वयन को लेकर समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि आखिर किशाऊ परियोजना इतनी महत्वपूर्ण क्यों है और इसके साथ उत्तराखंड के लिए सबसे बड़ी चुनौतियां क्या जुड़ी हैं।

क्या है किशाऊ परियोजना?

किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना टोंस नदी पर प्रस्तावित एक बड़ी जल-विद्युत और जल भंडारण परियोजना है। टोंस, यमुना की प्रमुख सहायक नदियों में शामिल है। प्रस्तावित परियोजना क्षेत्र उत्तराखंड के देहरादून और हिमाचल प्रदेश के सिरमौर क्षेत्र से जुड़ा है।

किशाऊ का उद्देश्य सिर्फ बिजली पैदा करना नहीं है। बांध के जरिए पानी का भंडारण कर सिंचाई, पेयजल और बिजली उत्पादन को बढ़ावा देने के साथ यमुना बेसिन में जल उपलब्धता को बेहतर करने की योजना है।

आधिकारिक परियोजना विवरण के अनुसार प्रस्तावित परियोजना की स्थापित क्षमता 660 मेगावाट है। इसमें करीब 1324 MCM लाइव स्टोरेज, लगभग 97,076 हेक्टेयर सिंचाई क्षमता और करीब 617 MCM पानी पेयजल एवं औद्योगिक उपयोग के लिए उपलब्ध कराने का प्रावधान है।

1940 में रखी गई थी नींव, निर्माण अब तक नहीं

किशाऊ परियोजना की कहानी करीब 86 साल पुरानी है। वर्ष 1940 में इसकी परिकल्पना और शुरुआती अध्ययन की शुरुआत हुई थी। इसका अर्थ यह नहीं है कि उसी वर्ष बांध का निर्माण शुरू हो गया था।

इसके बाद अलग-अलग समय पर सर्वे, तकनीकी अध्ययन और परियोजना रिपोर्ट तैयार की गईं। लेकिन अंतरराज्यीय सहमति, तकनीकी मुद्दों, लागत और अन्य प्रक्रियाओं के कारण परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी।

यानी दशकों तक किशाऊ परियोजना फाइलों, सर्वे और बैठकों के बीच ही घूमती रही।

आखिर क्यों अटकी रही परियोजना?

किशाऊ के अटकने के पीछे एक नहीं, बल्कि कई वजहें रहीं।

छह राज्यों के हितों का सवाल

किशाऊ परियोजना से उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली जुड़े हैं। ऐसे में पानी के बंटवारे, बिजली, लागत और परियोजना से मिलने वाले लाभों को लेकर सभी पक्षों के बीच सहमति बनाना बड़ी चुनौती रही।

यही अंतरराज्यीय समन्वय लंबे समय तक परियोजना के रास्ते में बड़ी अड़चन बना रहा।

हिमालयी क्षेत्र में बड़ा बांध, तकनीकी चुनौती

प्रस्तावित बांध करीब 236 मीटर ऊंचा कंक्रीट ग्रेविटी डैम है। हिमालयी क्षेत्र की भौगोलिक और भूकंपीय संवेदनशीलता को देखते हुए बांध की डिजाइन, सुरक्षा और निर्माण भी महत्वपूर्ण तकनीकी मुद्दे हैं।

इसलिए चुनौती केवल बांध बनाने की नहीं थी, बल्कि यह सुनिश्चित करने की भी थी कि संवेदनशील पहाड़ी क्षेत्र में इतनी बड़ी परियोजना सुरक्षित तरीके से कैसे बनाई जाए।

सबसे संवेदनशील मुद्दा—लोग और जमीन

किशाऊ परियोजना का सबसे बड़ा सामाजिक सवाल विस्थापन और पुनर्वास है।

परियोजना के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार जलाशय के कारण उत्तराखंड में करीब 1,452 हेक्टेयर और हिमाचल प्रदेश में करीब 1,498 हेक्टेयर क्षेत्र प्रभावित होगा। दोनों राज्यों में कुल प्रभावित क्षेत्र करीब 2,950 हेक्टेयर बताया गया है।

परियोजना के आंकड़ों में उत्तराखंड के 9 और हिमाचल प्रदेश के 8 गांव, यानी कुल 17 गांव प्रभावित होने की बात कही गई है। करीब 5,498 लोगों के पुनर्वास की जरूरत का भी उल्लेख है।

इनमें उत्तराखंड के करीब 3,406 लोग शामिल हैं।

यही आंकड़े इस परियोजना को विकास के साथ-साथ विस्थापन और पुनर्वास का भी बड़ा मुद्दा बनाते हैं।

उत्तराखंड के सामने पर्यावरण की चुनौती

किशाऊ परियोजना का दूसरा बड़ा सवाल पर्यावरण से जुड़ा है। परियोजना के लिए वन भूमि के इस्तेमाल के साथ क्षतिपूरक वनीकरण, जैव विविधता और स्थानीय आजीविका से जुड़े मुद्दे सामने आएंगे।

पहाड़ों में जमीन सीमित होने के कारण क्षतिपूरक वनीकरण के लिए पर्याप्त भूमि उपलब्ध कराना भी आसान नहीं होगा।

इसलिए उत्तराखंड के लिए सवाल केवल यह नहीं है कि परियोजना से कितना फायदा होगा, बल्कि यह भी है कि पर्यावरण और स्थानीय समुदायों पर पड़ने वाले प्रभाव को किस तरह कम किया जाएगा।

2026 में आखिर क्या बदला?

किशाऊ की लंबी कहानी में 2026 एक अहम मोड़ बनकर सामने आया।

16 जून 2026 को केंद्र और छह सहभागी राज्यों के बीच परियोजना से जुड़े लंबित मुद्दों पर महत्वपूर्ण सहमति बनी। इसके बाद बातचीत और समन्वय की प्रक्रिया आगे बढ़ी।

फिर 15 सितंबर 2026 को उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली ने परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए MoU पर हस्ताक्षर कर दिए।

करीब ₹15,000 करोड़ की इस परियोजना के लिए अंतरराज्यीय सहमति बनने के बाद अब इसके वास्तविक क्रियान्वयन की प्रक्रिया आगे बढ़ने की उम्मीद है।

छह राज्यों को क्या मिलेगा?

किशाऊ परियोजना के संभावित लाभ अलग-अलग राज्यों की जरूरतों से जुड़े हैं।

उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश को परियोजना के जलाशय और जलविद्युत उत्पादन से जुड़े लाभ मिलेंगे।

उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान के लिए सिंचाई और जल उपलब्धता महत्वपूर्ण लाभ होंगे।

वहीं दिल्ली के लिए पेयजल आपूर्ति बढ़ाने की संभावना महत्वपूर्ण है।

इसके अलावा प्रस्तावित 660 मेगावाट की जलविद्युत क्षमता से बिजली उत्पादन होगा। आधिकारिक परियोजना विवरण के अनुसार अनुमानित वार्षिक ऊर्जा उत्पादन करीब 1,379 मिलियन यूनिट (MU) है।

अब असली परीक्षा शुरू

MoU पर हस्ताक्षर होना किशाऊ परियोजना की मंजिल नहीं, बल्कि एक नए चरण की शुरुआत है।

अब परियोजना के सामने भूमि संबंधी प्रक्रिया, पर्यावरण एवं वन मंजूरियां, प्रभावित परिवारों का पुनर्वास, वित्तीय व्यवस्था और निर्माण जैसी चुनौतियां होंगी।

खासकर उत्तराखंड के लिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रभावित परिवारों को उचित मुआवजा, सम्मानजनक पुनर्वास और आजीविका की सुरक्षा कैसे दी जाती है।

साथ ही यह भी देखना होगा कि वन और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव को कम करने के लिए क्या ठोस उपाय किए जाते हैं।

किशाऊ परियोजना: 1940 से 2026 तक

1940 — परियोजना की परिकल्पना और शुरुआती अध्ययन
1960 का दशक — सर्वे और परियोजना रिपोर्टों पर काम
2008 — राष्ट्रीय परियोजना के रूप में महत्व
2015 — उत्तराखंड-हिमाचल के बीच संयुक्त व्यवस्था की दिशा में कदम
16 जून 2026 — लंबित मुद्दों के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण सहमति
15 सितंबर 2026 — छह राज्यों के बीच MoU पर हस्ताक्षर

बड़ा सवाल: फायदा किसका, कीमत किसकी?

किशाऊ परियोजना से छह राज्यों को पानी, सिंचाई और बिजली का लाभ मिलने की उम्मीद है। लेकिन उत्तराखंड के लिए इसका दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

क्या बड़े जलाशय और बिजली परियोजना का लाभ प्रभावित पहाड़ी परिवारों के नुकसान की भरपाई कर पाएगा?

और क्या विकास के साथ पर्यावरण, जंगल और स्थानीय लोगों के अधिकारों की पर्याप्त सुरक्षा हो पाएगी?

किशाऊ परियोजना की 86 साल पुरानी कहानी अब एक नए मोड़ पर है। MoU हो चुका है, लेकिन असली कहानी अब शुरू होगी—जब कागज पर बनी परियोजना पहाड़ की जमीन पर उतरनी शुरू होगी।

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