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नेपाल में बाढ़ के बाद 47 ग्लेशियर झीलों से मंडराया नए संकट का खतर

photo - livemint

 

 

 

 

काठमांडू: नेपाल में बुधवार (26 अगस्त 2026) को आई विनाशकारी बाढ़ में 160 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और कई लोग अब भी लापता हैं। इस बीच पर्यावरण वैज्ञानिकों और नेपाल सरकार के एक अध्ययन ने भविष्य के बड़े खतरे की चेतावनी दी है। अध्ययन के मुताबिक नेपाल और उसके आसपास 47 ग्लेशियर झीलें बेहद नाजुक स्थिति में हैं, जो कभी भी बड़ी तबाही का कारण बन सकती हैं।

इन झीलों के अचानक फटने से ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) आ सकती है, जिससे नदियों का जलस्तर रातों-रात बेकाबू हो सकता है। खतरे वाली 47 झीलों में 21 नेपाल की सीमा के भीतर और 25 तिब्बत क्षेत्र में हैं। तिब्बत से निकलने वाली नदियां नेपाल की ओर बहती हैं, इसलिए वहां ग्लेशियर झील टूटने की स्थिति में नेपाल के निचले इलाकों के गांव, शहर, सड़कें और पुल भी सीधे प्रभावित हो सकते हैं।

इन झीलों पर सबसे ज्यादा खतरा

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) और नेपाल के आपदा प्रबंधन दल ने कई झीलों को बेहद संवेदनशील माना है। इनमें कुछ झीलें मलबे और पत्थरों से बने कमजोर प्राकृतिक बांधों के पीछे स्थित हैं और तेजी से फैल रही हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक समय रहते पानी कम नहीं किया गया तो बड़ा हादसा हो सकता है।

सबसे खतरनाक मानी जाने वाली झीलों में लोअर बरुण (टैलोपोखरी), थुलागी (डोना), लुमडिंग त्सो, होंगु-2/चामलांग साउथ, त्सो रोल्पा और इमजा त्सो शामिल हैं।

कोशी-बागमती क्षेत्र पर सबसे बड़ा खतरा

ग्लेशियर झीलों के फटने की स्थिति में पूर्वी और मध्य नेपाल के कोशी और बागमती नदी क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं। आंकड़ों के अनुसार देश में इस संभावित आपदा के कुल खतरे का करीब 85 फीसदी हिस्सा इसी क्षेत्र में केंद्रित है।

तीन जिले विशेष रूप से संवेदनशील बताए गए हैं—

विशेषज्ञों के मुताबिक अगर समय रहते इन झीलों से पानी सुरक्षित तरीके से निकालने और निचले इलाकों में चेतावनी तंत्र मजबूत करने के कदम नहीं उठाए गए, तो नेपाल को एक और गंभीर मानवीय और आर्थिक त्रासदी का सामना करना पड़ सकता है।

इनपुट: IANS

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