उत्तराखंड का 18% इलाका भूस्खलन के हाई रिस्क जोन में, सबसे ज्यादा खतरे में उत्तरकाशी-चमोली
The Mountain People
देहरादून: उत्तराखंड में भूस्खलन का खतरा पहले से कहीं अधिक गंभीर तस्वीर पेश कर रहा है। एक नए वैज्ञानिक अध्ययन में सामने आया है कि राज्य का करीब 18.47 प्रतिशत भू-भाग उच्च और अति उच्च भूस्खलन जोखिम वाले क्षेत्र में आता है। अध्ययन के अनुसार उत्तरकाशी और चमोली सबसे अधिक संवेदनशील जिले हैं, जबकि हरिद्वार और ऊधम सिंह नगर अपेक्षाकृत सुरक्षित माने गए हैं।
यह अध्ययन शिव नादर विश्वविद्यालय की डिजास्टर मैनेजमेंट लैब के शोधकर्ताओं ने किया है, जिसे अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका Geoenvironmental Disasters में प्रकाशित किया गया है। शोध में उत्तराखंड के लगभग 53,400 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का विश्लेषण किया गया।
शोधकर्ताओं ने भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) के रिकॉर्ड में दर्ज 7,182 पुराने भूस्खलन स्थलों का अध्ययन किया। इनमें अधिकांश चट्टानी और मलबा आधारित भूस्खलन शामिल रहे। इसके आधार पर पूरे राज्य को पांच जोखिम श्रेणियों में विभाजित किया गया।
अध्ययन के मुताबिक उत्तरकाशी (1,165), चमोली (1,076) और पिथौरागढ़ (1,048) में सबसे अधिक भूस्खलन स्थल दर्ज किए गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इन क्षेत्रों में तीखी ढलान, अधिक वर्षा, कमजोर भूगर्भीय संरचना और संवेदनशील पर्वतीय भू-आकृति जोखिम को बढ़ाती है।
16 वैज्ञानिक मानकों पर हुआ मूल्यांकन
शोध में भूस्खलन की आशंका का आकलन करने के लिए 16 प्रमुख वैज्ञानिक मानकों का उपयोग किया गया। इनमें ऊंचाई, ढलान, वर्षा, मिट्टी का प्रकार, भूमि उपयोग, वनस्पति, नदियों और सड़कों से दूरी, भू-भ्रंश (फॉल्ट) और मिट्टी की नमी जैसे कारक शामिल रहे। इसके लिए जीएसआई, भारतीय मौसम विभाग, नासा, यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी और अन्य वैश्विक संस्थानों के डेटा का उपयोग किया गया।
आपदा प्रबंधन के लिए अहम संकेत
विशेषज्ञों का मानना है कि यह अध्ययन राज्य में सड़क निर्माण, शहरी विकास, चारधाम यात्रा मार्गों की योजना और आपदा प्रबंधन रणनीति तैयार करने में उपयोगी साबित हो सकता है। संवेदनशील क्षेत्रों की पहले से पहचान होने पर जोखिम कम करने और समय रहते आवश्यक कदम उठाने में मदद मिलेगी।