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युद्धभूमि में साहस, राजनीति में ईमानदारी… ऐसा था पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी का व्यक्तित्व

 

 

 

 

देहरादून: मेजर जनरल खंडूड़ी का सैन्य जीवन अनुशासन, समर्पण और उत्कृष्ट नेतृत्व का प्रतीक रहा। भारतीय सेना में एक युवा अधिकारी के रूप में शुरुआत करने वाले खंडूड़ी ने अपने 36 वर्षों के लंबे सैन्य करियर में देश की सुरक्षा और सैन्य ढांचे को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई।

वर्ष 1954 में वह भारतीय सेना में सेकेंड लेफ्टिनेंट के पद पर भर्ती हुए और अपनी मेहनत, नेतृत्व क्षमता तथा कर्तव्यनिष्ठा के बल पर वर्ष 1991 में मेजर जनरल के पद से सेवानिवृत्त हुए। अपने सैन्य जीवन के दौरान उन्होंने वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध तथा 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्धों में सक्रिय भूमिका निभाई। 1971 के युद्ध में उन्होंने ‘कमांडर ऑफ द रेजीमेंट’ के रूप में जिम्मेदारी निभाते हुए अद्भुत नेतृत्व का परिचय दिया।

देहरादून से शुरू हुआ सफर, सेना में पाया सम्मान

खंडूड़ी का जन्म 1 अक्टूबर 1934 को देहरादून में जय वल्लभ खंडूड़ी और दुर्गा देवी के घर हुआ। बचपन से ही उनके भीतर सेना में जाकर देश सेवा करने का सपना था। यह सपना तब साकार हुआ जब वह इंजीनियर्स कोर में अधिकारी के रूप में शामिल हुए।

प्रारंभिक वर्षों में कठिन परिस्थितियों में कार्य करते हुए उन्होंने अपनी कार्यकुशलता और नेतृत्व क्षमता साबित की। समय-समय पर उन्हें पदोन्नति मिलती रही और वह सेकेंड लेफ्टिनेंट से लेफ्टिनेंट, कैप्टन, मेजर, लेफ्टिनेंट कर्नल, कर्नल, ब्रिगेडियर होते हुए मेजर जनरल के पद तक पहुंचे।

सीमाओं पर मजबूत किया सैन्य ढांचा

इंजीनियर्स कोर से जुड़े होने के कारण उन्होंने सेना के लिए कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं को सफलतापूर्वक पूरा किया। सीमावर्ती और दुर्गम क्षेत्रों में सड़क, पुल और रणनीतिक ढांचे के निर्माण में उनका योगदान उल्लेखनीय माना जाता है। उनके नेतृत्व में कई सैन्य परियोजनाएं तय समय सीमा में पूरी की गईं, जिससे सेना की संचालन क्षमता को मजबूती मिली।

मेजर जनरल के रूप में उनकी पहचान एक सख्त लेकिन न्यायप्रिय अधिकारी की रही। अधीनस्थ अधिकारी और जवान उन्हें अनुशासन, ईमानदारी और स्पष्ट कार्यशैली के लिए याद करते हैं। उन्होंने सेना में टीम वर्क और जवानों का मनोबल बढ़ाने पर विशेष जोर दिया।

उत्कृष्ट सेवाओं के लिए मिला सम्मान

देश सेवा में उनके उल्लेखनीय योगदान को देखते हुए वर्ष 1983 में तत्कालीन राष्ट्रपति द्वारा उन्हें ‘अति विशिष्ट सेवा मेडल’ से सम्मानित किया गया। सेना में उन्होंने चीफ इंजीनियर और सेना मुख्यालय में अपर सैन्य सचिव जैसे महत्वपूर्ण पदों पर भी जिम्मेदारी निभाई।

शिक्षा और प्रबंधन में भी रहे अग्रणी

खंडूड़ी ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से विज्ञान में स्नातक की पढ़ाई की। इसके बाद कॉलेज ऑफ मिलिट्री इंजीनियरिंग से सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की। उन्होंने इंस्टीट्यूट ऑफ डिफेंस मैनेजमेंट, सिकंदराबाद से उच्च शिक्षा प्राप्त की तथा ‘मेंबर ऑफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियर्स इंडिया’ (एमआईई) से प्रबंधन में परास्नातक की डिग्री भी हासिल की।

संसद में उठाई रक्षा तैयारियों की आवाज

राजनीति में आने के बाद भी उनकी स्पष्टवादिता और राष्ट्रहित सर्वोपरि रखने की सोच कायम रही। संसद की रक्षा संबंधी स्थायी समिति के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने देश के रक्षा तंत्र की वास्तविक स्थिति को मजबूती से सामने रखा।

उनकी समिति की रिपोर्ट में कहा गया था कि सशस्त्र बलों के लगभग 68 प्रतिशत सैन्य उपकरण पुराने हो चुके हैं और युद्ध की स्थिति में पर्याप्त रिजर्व उपलब्ध नहीं हैं। रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई थी कि सेना के पास सीमित अवधि तक ही युद्ध संचालन योग्य गोला-बारूद उपलब्ध है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

मेजर जनरल खंडूड़ी की इन स्पष्ट और तथ्याधारित टिप्पणियों ने रक्षा मंत्रालय और केंद्र सरकार पर सैन्य आधुनिकीकरण को तेज करने का दबाव बनाया। उनकी रिपोर्ट को रक्षा मामलों में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज माना गया।

 
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