नैनीताल: भारतीय वन सेवा (IFS) अधिकारी संजीव चतुर्वेदी की गोपनीय रिपोर्ट (APAR) को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद में नया मोड़ आ गया है। भारत सरकार ने केंद्रीय प्रशासनिक अभिकरण (CAT) के सात साल पुराने आदेश को रद्द कराने के लिए उत्तराखंड हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। साथ ही इस वर्ष 25 मई को कैट द्वारा जारी अवमानना नोटिस को भी रद्द करने की मांग की गई है।
हाईकोर्ट में हुई सुनवाई, अटॉर्नी जनरल ने रखी केंद्र की बात
शुक्रवार को मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जी. नरेंद्र और न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की खंडपीठ में हुई सुनवाई में केंद्र सरकार की ओर से भारत के अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने पक्ष रखा। उन्होंने मांग की कि संजीव चतुर्वेदी से जुड़े कैट के पुराने आदेशों को रद्द किया जाए, जिनमें चतुर्वेदी के वर्ष 2015-16 की वार्षिक गोपनीय मूल्यांकन रिपोर्ट (APAR) में की गई डाउनग्रेडिंग को चुनौती दी गई थी।
क्या है मामला?
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संजीव चतुर्वेदी ने जुलाई 2017 में कैट की नैनीताल सर्किट बेंच में याचिका दायर कर अपनी डाउनग्रेड की गई एपीएआर को चुनौती दी थी।
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उन्होंने आरोप लगाया था कि एम्स में कार्यकाल (2012-2016) के दौरान भ्रष्टाचार के मामलों को उठाने के चलते प्रतिशोध स्वरूप उनकी एपीएआर को जानबूझकर कमजोर किया गया।
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सितंबर 2017 में कैट ने डाउनग्रेडिंग के आदेश के क्रियान्वयन और प्रभाव पर रोक लगा दी थी।
दस्तावेजों की उपलब्धता और अवमानना नोटिस
23 फरवरी 2023 को कैट ने कैबिनेट सचिव, स्वास्थ्य सचिव, एम्स और केंद्रीय सतर्कता आयोग को संजीव चतुर्वेदी को दस्तावेज उपलब्ध कराने का आदेश दिया था। इसके अनुपालन में देरी को लेकर 25 मई 2024 को कैट ने अवमानना नोटिस जारी किया था।
अब केंद्र की मांग क्या है?
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2018 और 2023 के आदेशों को रद्द किया जाए।
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कैट का 25 मई का अवमानना नोटिस निरस्त किया जाए।
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कैट में चल रही मुख्य याचिका में कैबिनेट सचिव का नाम हटाकर कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के सचिव का नाम शामिल किया जाए।
संजीव चतुर्वेदी का पक्ष
चतुर्वेदी का आरोप है कि दिल्ली एम्स में प्रतिनियुक्ति के दौरान उन्होंने कई वरिष्ठ अधिकारियों और चिकित्सकों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों को उजागर किया था। उनके अनुसार, इसके बदले उन्हें प्रशासनिक प्रताड़ना दी गई और उनकी गोपनीय रिपोर्ट को जानबूझकर खराब किया गया।
संजीव चतुर्वेदी बनाम केंद्र सरकार का यह मामला न केवल एक अफसर की गोपनीय रिपोर्ट तक सीमित है, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता, भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष और सिस्टम में जवाबदेही जैसे गहरे सवाल खड़े करता है। हाईकोर्ट में लंबित यह याचिका अब आने वाले समय में इस दिशा में अहम संकेत दे सकती है।
