देवभूमि में लोकतंत्र और संस्कृति का संगम: एक ओर बूथों पर हरियाली का संकल्प, दूसरी ओर नेलांग-जादुंग में गूंजे देव-डोल, रासो तांदी की थाप

 

 

देहरादून/उत्तरकाशी:  उत्तराखंड इन दिनों एक साथ दो ऐतिहासिक पहलुओं का साक्षी बन रहा है—जहां एक ओर देहरादून जिला निर्वाचन कार्यालय ने 5 जून से हरेला पर्व (जुलाई) तक हर पोलिंग बूथ पर पौधरोपण का संकल्प लिया है, वहीं दूसरी ओर सीमांत गांव नेलांग-जादुंग में भोटिया जाट समुदाय ने देव-डोलियों के साथ परंपरा की वापसी का संदेश दिया है।

हर बूथ, हरियाली का प्रतीक

देहरादून प्रशासन की यह पहल लोकतंत्र को प्रकृति से जोड़ने की अभिनव सोच को दर्शाती है। 1882 पोलिंग बूथों पर पौधरोपण कर मतदाताओं को पर्यावरण संरक्षण से जोड़ने का प्रयास किया जाएगा। प्रत्येक बूथ पर नए मतदाता, महिलाएं, बुजुर्ग और अन्य समुदायों की सहभागिता सुनिश्चित की जाएगी।

सीमांत नेलांग में लौटी परंपरा की गूंज

वहीं, दूसरी ओर 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद खाली कराए गए सीमांत गांव नेलांग और जादुंग में इस साल फिर से जीवन की आहट सुनाई दी। भोटिया जाट समुदाय के ग्रामीण रिंगाली देवी की डोली, डोल दमाऊ के साथ अपने पैतृक गांव लौटे और रासो तांदी नृत्य कर धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक पुनर्जीवन का संदेश दिया।

वाइब्रेंट विलेज योजना से संवर रहा सीमांत क्षेत्र

नेलांग-जादुंग गांव को भारत सरकार की वाइब्रेंट विलेज योजना के तहत फिर से बसाया जा रहा है। कुछ इलाकों में मोबाइल कनेक्टिविटी शुरू हो गई है और होम स्टे निर्माण पर भी कार्य प्रगति पर है। इन गांवों की सामरिक और सांस्कृतिक महत्ता को देखते हुए सरकार का यह कदम सराहनीय है।

उत्तराखंड में इस समय एक साथ लोकतंत्र, प्रकृति और परंपरा की त्रिवेणी बह रही है। देहरादून में जहां हर पोलिंग बूथ हरियाली की सौगात बन रहा है, वहीं सीमांत गांवों में संस्कृति की जड़ें फिर से गहरी हो रही हैं। यह न सिर्फ विकास की कहानी है, बल्कि पहाड़ के आत्मसम्मान और आस्था की वापसी की मिसाल भी है।

 
 
 
(Visited 1,540 times, 1 visits today)