₹8,600 महीने में कैसे चलेगा न्यूज़ पोर्टल? सरकारी विज्ञापन के आंकड़ों ने खड़े किए बड़े सवाल

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देहरादून: उत्तराखंड के सूचना एवं लोक संपर्क विभाग द्वारा जारी विज्ञापनों के उपलब्ध आंकड़े प्रदेश की स्थानीय और डिजिटल पत्रकारिता की आर्थिक स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। उपलब्ध विवरण के अनुसार, लगभग 36 महीनों की अवधि में कुल 16 विज्ञापन जारी किए गए, जिनकी कुल राशि ₹3,09,500 रही। यानी औसतन एक वर्ष में करीब ₹1.03 लाख और प्रति माह लगभग ₹8,600 का विज्ञापन।

यही नहीं, यह राशि भी नियमित रूप से हर महीने नहीं मिली। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, एक वर्ष में केवल 4 से 5 महीनों में ही विज्ञापन जारी हुए। ऐसे में सवाल उठता है कि शेष महीनों में छोटे समाचार संस्थान अपने संचालन का खर्च कैसे उठाएं?

आज के दौर में किसी भी समाचार पोर्टल या छोटे मीडिया संस्थान को संचालित करने के लिए वेबसाइट का रखरखाव, डोमेन-होस्टिंग, सर्वर, इंटरनेट, बिजली, कैमरा, रिपोर्टिंग, यात्रा और कर्मचारियों के मानदेय जैसे कई नियमित खर्च होते हैं। ऐसे में औसतन ₹8,600 मासिक विज्ञापन राशि किसी भी संस्थान के लिए पर्याप्त नहीं मानी जा सकती।

स्थानीय पत्रकारों का कहना है कि वे सरकार की योजनाओं और जनहित से जुड़ी सूचनाओं को गांव-गांव तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाते हैं। इसके बावजूद यदि विज्ञापन सीमित और अनियमित रूप से मिलें, तो छोटे और मध्यम मीडिया संस्थानों पर आर्थिक दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। उनका मानना है कि यह केवल विज्ञापन राशि का मुद्दा नहीं, बल्कि स्थानीय और स्वतंत्र पत्रकारिता के भविष्य से जुड़ा विषय है।

वर्षवार आंकड़े

  • 2023: 4 विज्ञापन, कुल राशि ₹75,000 (औसत मासिक लगभग ₹6,250)
  • 2024: 5 विज्ञापन, कुल राशि ₹99,500 (औसत मासिक लगभग ₹8,292)
  • 2025: 5 विज्ञापन, कुल राशि ₹95,000 (औसत मासिक लगभग ₹7,917)

इन आंकड़ों के सामने आने के बाद कई सवाल चर्चा में हैं। क्या इतनी राशि में कोई समाचार संस्थान नियमित रूप से संचालित हो सकता है? जब विज्ञापन पूरे वर्ष में केवल कुछ ही बार मिलें, तो बाकी महीनों का संचालन कैसे होगा? क्या छोटे और क्षेत्रीय मीडिया संस्थानों के लिए विज्ञापन वितरण व्यवस्था की समीक्षा की जानी चाहिए? और क्या स्थानीय पत्रकारिता को मजबूत बनाने के लिए अधिक पारदर्शी एवं संतुलित नीति की जरूरत नहीं है?

यह मुद्दा केवल आर्थिक सहायता का नहीं, बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की मजबूती से भी जुड़ा है। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार स्थानीय और क्षेत्रीय मीडिया को मजबूत देखना चाहती है, तो विज्ञापन वितरण व्यवस्था की प्रभावशीलता और पारदर्शिता पर व्यापक स्तर पर विचार किए जाने की आवश्यकता है।

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