अवैध मकानों पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा संदेश, राज्यों से नीति बनाने पर विचार करने को कहा

 

 

 

नई दिल्ली: देशभर में लंबे समय से मौजूद अवैध निर्माणों को नियमित करने और उन्हें हटाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने इस मामले में एक समान राष्ट्रीय नीति बनाने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को अपने स्तर पर नीति बनाने या मौजूदा नियमों की समीक्षा करते समय इन मुद्दों पर विचार करने को कहा।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने कहा कि अलग-अलग राज्यों में परिस्थितियां और जमीनी वास्तविकताएं अलग हैं। ऐसे में पूरे देश के लिए एक ही नीतिगत व्यवस्था तय करना अदालत के लिए उचित नहीं होगा।

गरीबों के घर बचाने की मांग वाली याचिका

यह जनहित याचिका ‘सेंटर फॉर लॉ एंड गुड गवर्नेंस’ की ओर से दायर की गई थी। इसमें केंद्र और राज्यों को ऐसी नीति बनाने का निर्देश देने की मांग की गई थी, जिससे लंबे समय से मौजूद अवैध निर्माणों को नियमित करने और उन्हें हटाने के बीच संतुलन बनाया जा सके।

याचिका में विशेष रूप से आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के घरों को अचानक गिराए जाने पर चिंता जताई गई। याचिकाकर्ता का कहना था कि कई मामलों में लोगों को पर्याप्त नोटिस दिए बिना या उनके पुनर्वास की व्यवस्था किए बिना निर्माण ध्वस्त कर दिए जाते हैं।

40-50 साल बाद घर अवैध बताने पर सवाल

याचिका पर सुनवाई के दौरान वकील ने दलील दी कि कई मामलों में स्थानीय निकाय लंबे समय तक लोगों से संपत्ति कर और अन्य शुल्क वसूलते हैं, वहीं बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जाती हैं।

ऐसे में दशकों बाद अचानक उसी निर्माण को अवैध बताकर गिराने की कार्रवाई किए जाने से परिवारों के सामने गंभीर संकट पैदा हो सकता है। याचिका में कहा गया कि ऐसी कार्रवाई से पहले आवास, आजीविका और गरिमा के अधिकार को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

अवैध कब्जे पर भी कानूनी प्रक्रिया जरूरी

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही अवैध और बिना उचित प्रक्रिया के तोड़फोड़ के खिलाफ सुरक्षा उपाय तय कर चुका है। पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति का लंबे समय से किसी स्थान पर रहना अपने आप में उसे उस संपत्ति पर कानूनी अधिकार नहीं देता। हालांकि, उसे उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना हटाया नहीं जा सकता। अदालत ने यह भी दोहराया कि अवैध कब्जे या निर्माण को हटाने से पहले प्रभावित व्यक्ति को कम से कम 15 दिन का नोटिस दिया जाना चाहिए।

बेघर होने वालों के पुनर्वास पर भी ध्यान

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी महत्वपूर्ण बात कही कि जब प्रशासन अवैध निर्माण हटाने की कार्रवाई करता है तो उसकी जिम्मेदारी केवल कानून लागू करने तक सीमित नहीं रह सकती। अधिकारियों को यह भी देखना चाहिए कि कार्रवाई के बाद कितने परिवार बेघर होंगे और उनके पुनर्वास की क्या व्यवस्था हो सकती है।

हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हर अवैध निर्माण को आर्थिक रूप से कमजोर लोगों से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। कई अवैध इमारतें व्यावसायिक या मुनाफे के उद्देश्य से भी बनाई जाती हैं।

देशभर में एक जैसी नीति बनाने से अदालत का इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यों में जमीन, स्थानीय कानून और परिस्थितियां अलग-अलग हैं। इसलिए पूरे देश के लिए एक समान नीति तय करने के बजाय राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को अपने मौजूदा नियमों की समीक्षा कर उचित नीति पर विचार करना चाहिए।

इस फैसले से अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई और प्रभावित परिवारों के अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर राज्यों की जिम्मेदारी एक बार फिर सामने आई है।

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