मशीन-रीडेबल वोटर लिस्ट पर बदला रुख? कांग्रेस ने चुनाव आयोग को घेरा

 

 

 

TMP: मतदाता सूची को मशीन-रीडेबल प्रारूप में उपलब्ध कराने का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में है। कांग्रेस की ओर से दावा किया गया है कि पार्टी लंबे समय से चुनाव आयोग से ऐसी मतदाता सूची उपलब्ध कराने की मांग कर रही थी, ताकि आंकड़ों का तकनीकी और वैज्ञानिक तरीके से विश्लेषण किया जा सके। पार्टी ने इस मुद्दे को राहुल गांधी के संसद में उठाने, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की ओर से पत्र लिखने और प्रतिनिधिमंडलों की मुलाकातों से भी जोड़ा है।

कांग्रेस के मुताबिक, मशीन-रीडेबल वोटर लिस्ट की मांग का उद्देश्य मतदाता सूची में संभावित गड़बड़ियों की पहचान करना और उनकी जांच को आसान बनाना है। पार्टी ने चुनाव आयोग की ओर से सूची के प्रारूप और डेटा की उपलब्धता को लेकर अपनाए गए रुख पर सवाल उठाए हैं।

महादेवपुरा सीट के आंकड़ों से उठे सवाल

अगस्त 2025 में राहुल गांधी ने कर्नाटक की महादेवपुरा विधानसभा सीट की मतदाता सूची का हवाला देते हुए कथित अनियमितताओं का मुद्दा उठाया था। उनके दावे के अनुसार, इस सीट पर करीब 1.25 लाख संदिग्ध प्रविष्टियां सामने आई थीं। राहुल गांधी ने कहा था कि सीमित क्षेत्र की मतदाता सूची का विश्लेषण करने में भी कांग्रेस की टीम को कई महीने लगे।

कांग्रेस का तर्क है कि यदि मतदाता सूची मशीन-रीडेबल प्रारूप में उपलब्ध हो, तो बड़े पैमाने पर आंकड़ों का विश्लेषण करना और संदिग्ध प्रविष्टियों की पहचान करना अधिक आसान हो सकता है। हालांकि, पार्टी की ओर से लगाए गए आरोपों और उनकी पुष्टि के बीच अंतर को ध्यान में रखना जरूरी है।

राहुल गांधी और चुनाव आयोग के बीच बढ़ा विवाद

इस मुद्दे पर राहुल गांधी और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के बीच भी सार्वजनिक रूप से तीखी बयानबाजी हुई थी। कांग्रेस के अनुसार, राहुल गांधी से आरोपों के समर्थन में हलफनामा देने या माफी मांगने को कहा गया था। पार्टी ने इसे अपने सवालों का जवाब देने के बजाय राजनीतिक टकराव बढ़ाने वाला कदम बताया।

कांग्रेस का कहना है कि मतदाता सूची की पारदर्शिता केवल किसी एक राजनीतिक दल का विषय नहीं, बल्कि चुनावी प्रक्रिया में जनता के भरोसे से जुड़ा सवाल है। पार्टी ने यह भी मांग की है कि राजनीतिक दलों को उपलब्ध कराए जाने वाले डेटा का प्रारूप ऐसा हो, जिससे उसका स्वतंत्र तकनीकी परीक्षण किया जा सके।

2018 के मध्य प्रदेश मामले का भी दिया हवाला

कांग्रेस ने अपने आरोपों के समर्थन में 2018 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची को लेकर उठे विवाद का भी जिक्र किया है। पार्टी का दावा है कि उस समय उसने करीब 27 लाख संदिग्ध नामों का मुद्दा उठाया था। कांग्रेस ने बाद में बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने को लेकर सवाल किए और पूछा कि यदि उसकी आपत्तियां निराधार थीं, तो इतनी बड़ी संख्या में नाम हटाने की जरूरत क्यों पड़ी।

इन आंकड़ों और उनके संदर्भ की स्वतंत्र पुष्टि के बिना इन्हें स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता। मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया के कारणों को समझने के लिए संबंधित निर्वाचन रिकॉर्ड और चुनाव आयोग के आधिकारिक स्पष्टीकरण का परीक्षण जरूरी है।

पारदर्शिता और डेटा तक पहुंच पर बहस

कांग्रेस का आरोप है कि मतदाता सूची को ऐसे प्रारूप में उपलब्ध कराया जाता रहा, जिससे कंप्यूटर के जरिए बड़े पैमाने पर उसका विश्लेषण करना कठिन हो जाता है। पार्टी का कहना है कि मशीन-रीडेबल डेटा मिलने से मतदाता सूची में दोहराव, गलत प्रविष्टियों और अन्य संभावित विसंगतियों की जांच अधिक व्यवस्थित ढंग से की जा सकती है।

वहीं, इस पूरे विवाद में चुनाव आयोग का आधिकारिक पक्ष, डेटा उपलब्ध कराने से जुड़े नियम और मतदाताओं की व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा जैसे पहलू भी महत्वपूर्ण हैं।

मतदाता सूची की पारदर्शिता पर जारी यह बहस अब केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं है। इसका मूल सवाल यह है कि राजनीतिक दलों को उपलब्ध कराए जाने वाले चुनावी आंकड़ों की जांच किस हद तक संभव होनी चाहिए और इस प्रक्रिया में पारदर्शिता के साथ मतदाताओं की निजता की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए।

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