कम बजट की फिल्म का 400 करोड़ पार करना, कांतारा की लोकसंस्कृति और तुम्बाड़ की मिथकीय दुनिया… भारतीय सिनेमा में आस्था अब सिर्फ धार्मिक कथा नहीं, कहानी कहने का नया आधार बन रही है
स्पेशल स्टोरी। एक तरफ 2 करोड़ रुपये से कम बजट में बनी फिल्म 400 करोड़ रुपये से ज्यादा का कारोबार कर देती है। दूसरी तरफ जंगल, लोकदेवी, लोकविश्वास और रहस्य से जुड़ी कहानी बड़े सितारों के साथ सिनेमाघरों में पहुंचती है। कहीं कर्नाटक की स्थानीय परंपरा पैन-इंडिया दर्शकों तक पहुंचती है तो कहीं भारतीय मिथक हॉरर की दुनिया रचता है।
इन फिल्मों को अलग-अलग जॉनर में रखा जा सकता है, लेकिन इनके बीच एक साझा धागा नजर आता है—भारतीय लोकविश्वास और सांस्कृतिक जड़ें।
‘हनुमान अंश’ की असाधारण सफलता से लेकर ‘The Vvaan: Force of the Forrest’ की शुरुआती कमाई, ‘कांतारा’, ‘तुम्बाड़’ और ‘महावतार नरसिम्हा’ तक सवाल यही है कि क्या दर्शक अब अपनी जड़ों से निकली कहानियों को आधुनिक अंदाज में देखने के लिए ज्यादा तैयार है?
या फिर यह सिर्फ कुछ सफल फिल्मों के बाद दिखाई दे रहा एक ट्रेंड है?
नेशनल अवॉर्ड विनर फिल्म क्रिटिक संजीव श्रीवास्तव के मुताबिक किसी सफल फिल्म का फॉर्मूला देखकर उसी रास्ते पर चल पड़ना सफलता की गारंटी नहीं है। उनके अनुसार कहानी की गहराई, विषय की समझ, लॉजिक, होमवर्क और प्रस्तुति ही तय करते हैं कि दर्शक किसी फिल्म से कितना जुड़ता है।
2 करोड़ से कम बजट और 400 करोड़ से ज्यादा कारोबार
‘हनुमान अंश’ ने बॉक्स ऑफिस पर अपने प्रदर्शन से सबसे ज्यादा ध्यान खींचा। नीम करोली बाबा के जीवन से प्रेरित बताई जा रही इस फिल्म का बजट 2 करोड़ रुपये से कम बताया गया, जबकि वर्ल्डवाइड कारोबार 400 करोड़ रुपये से ज्यादा और भारत में नेट कलेक्शन 300 करोड़ रुपये के पार पहुंचा। यहां दिलचस्प बात सिर्फ कमाई नहीं है।
फिल्म किसी बड़ी एक्शन फ्रेंचाइजी, भारी-भरकम वीएफएक्स या सुपरस्टार के सहारे खड़ी नहीं थी। कहानी का केंद्र एक संत की जीवन यात्रा और आध्यात्मिकता थी। यानी एक ऐसी कहानी, जिसकी ताकत उसका विषय और उससे जुड़ा भावनात्मक विश्वास था। लेकिन इसे केवल ‘भक्ति की लहर’ कहना पूरी तस्वीर नहीं बताता। फिल्म का सरल ट्रीटमेंट और दर्शकों के साथ बना भावनात्मक रिश्ता भी इसकी सफलता का हिस्सा रहा।
अब लोकविश्वास पहुंचा सुपरनैचुरल थ्रिलर तक
यहीं से ‘The Vvaan: Force of the Forrest’ की कहानी दिलचस्प हो जाती है। सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया स्टारर यह फिल्म पारंपरिक धार्मिक फिल्म नहीं है। इसकी पृष्ठभूमि लोकविश्वास और वन देवी से जुड़ी मान्यताओं में है, लेकिन कहानी को सुपरनैचुरल फैंटेसी और थ्रिलर के अंदाज में पेश किया गया है।
एक शहरी युवक अपने पुश्तैनी गांव और रहस्यमयी जंगल तक पहुंचता है। वहां उसका सामना ऐसी मान्यताओं से होता है, जिन्हें उसकी आधुनिक और तर्कवादी सोच आसानी से स्वीकार नहीं करती।
यहीं कहानी में टकराव पैदा होता है— आधुनिक सोच बनाम परंपरा। तर्क बनाम विश्वास। यानी जड़ें पुरानी हैं, लेकिन कहानी कहने का तरीका नया है।
पांच दिन में 44.85 करोड़, लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी
25 सितंबर को रिलीज हुई ‘The Vvaan’ ने करीब 8 करोड़ रुपये के इंडिया नेट कलेक्शन से शुरुआत की। शुरुआती दिनों में कमाई बढ़ी और पांचवें दिन तक भारत में फिल्म का नेट कलेक्शन करीब 44.85 करोड़ रुपये बताया गया। वर्ल्डवाइड ग्रॉस करीब 57.95 करोड़ रुपये रहा, जबकि फिल्म का रिपोर्टेड बजट करीब 80 करोड़ रुपये है।
इन आंकड़ों को देखते हुए फिल्म की शुरुआत पर चर्चा स्वाभाविक है, लेकिन इसे ‘हनुमान अंश’ जैसी असाधारण सफलता से जोड़ना अभी जल्दबाजी होगी। दोनों फिल्मों का बजट, जॉनर और दर्शक वर्ग अलग है।
फिर भी ‘The Vvaan’ एक बात जरूर दिखाती है—लोकविश्वास पर आधारित कहानी को मुख्यधारा के जॉनर में पेश करने की गुंजाइश मौजूद है।
कांतारा ने साबित किया—लोकल कहानी की अपनी ताकत होती है
भारतीय सिनेमा में इस रास्ते की सबसे चर्चित मिसालों में ‘कांतारा’ का नाम आता है।ऋषभ शेट्टी की 2022 में रिलीज हुई फिल्म ने कर्नाटक की स्थानीय संस्कृति, भूत कोला, जंगल, जमीन और लोकविश्वास को कहानी के केंद्र में रखा।
फिल्म की खासियत यह थी कि उसने अपनी क्षेत्रीय पहचान को छिपाने की कोशिश नहीं की। वही स्थानीय संस्कृति उसकी कहानी की पहचान बन गई। फिल्म ने करीब 309 करोड़ रुपये का इंडिया नेट कलेक्शन किया और वर्ल्डवाइड कारोबार 400 करोड़ रुपये से ज्यादा रहा।
कांतारा का मॉडल यह बताता है कि पैन-इंडिया कहानी बनने के लिए अपनी मिट्टी छोड़ना जरूरी नहीं। कई बार वही मिट्टी कहानी की सबसे बड़ी ताकत बन जाती है।
तुम्बाड़ ने मिथक को डर में बदला
‘तुम्बाड़’ ने इसी सामग्री को एक बिल्कुल अलग दिशा दी। यह पारंपरिक धार्मिक फिल्म नहीं थी। लेकिन इसकी दुनिया भारतीय लोककथा, मिथकीय कल्पना और भय से बनी थी। 2018 में रिलीज हुई फिल्म उस समय बड़ी व्यावसायिक सफलता हासिल नहीं कर सकी। लेकिन 2024 की री-रिलीज में करीब 32 करोड़ रुपये का घरेलू कारोबार किया।
यह सिर्फ दोबारा रिलीज हुई फिल्म की कमाई नहीं थी। यह इस बात का संकेत भी था कि दर्शक पुराने विषयों और अलग तरह की कहानियों को नए सिरे से खोज रहा है। यानी भारतीय मिथक सिर्फ पूजा और पौराणिक फिल्मों तक सीमित नहीं हैं। उन्हें हॉरर, फैंटेसी और थ्रिलर में भी बदला जा सकता है।
महावतार नरसिम्हा: कहानी पुरानी, माध्यम नया
2025 की ‘महावतार नरसिम्हा’ ने पौराणिक कथा को एनीमेशन के जरिए नई पीढ़ी तक पहुंचाने की कोशिश की। फिल्म का इंडिया नेट कलेक्शन करीब 182 करोड़ रुपये और वर्ल्डवाइड कारोबार 300 करोड़ रुपये से ज्यादा बताया गया। यहां फिर वही सवाल सामने आता है—क्या दर्शक पुरानी कहानी से दूर हो रहा है? या वह सिर्फ उसे नए तरीके से देखना चाहता है? शायद यही अंतर मौजूदा बदलाव को समझने में मदद करता है। कहानी पुरानी हो सकती है, लेकिन उसका माध्यम, ट्रीटमेंट और सिनेमाई दुनिया नई हो सकती है।
क्या आस्था बन गई है बॉक्स ऑफिस का नया फॉर्मूला?
यही वह जगह है जहां सावधानी जरूरी है। ‘हनुमान अंश’, ‘कांतारा’, ‘तुम्बाड़’, ‘महावतार नरसिम्हा’ और ‘The Vvaan’ को एक ही ट्रेंड में रखना आसान है, लेकिन सभी फिल्मों की सफलता के कारण एक जैसे नहीं हैं।
फिल्म क्रिटिक संजीव श्रीवास्तव के मुताबिक किसी सफल फिल्म को देखकर उसी विषय पर फिल्में बनाने की भेड़चाल शुरू कर देना हिट की गारंटी नहीं है। उनका कहना है कि आज का दर्शक कहानी के पीछे का लॉजिक देखता है। सिर्फ धार्मिक या आध्यात्मिक विषय होना पर्याप्त नहीं है। फिल्म बनाने वाले ने विषय को कितनी गहराई से समझा?
उस पर कितना होमवर्क किया?
कहानी में कितना लॉजिक है?
किरदार कितने विश्वसनीय हैं?
और सबसे महत्वपूर्ण—उसे पर्दे पर किस तरह पेश किया गया है?
इन सवालों के जवाब ही दर्शक और फिल्म के बीच कनेक्शन तय करते हैं।
हनुमान अंश ने रास्ता दिखाया, लेकिन हर फिल्म की मंजिल अलग
संजीव श्रीवास्तव के मुताबिक ‘हनुमान अंश’ की सफलता ने धार्मिक और आध्यात्मिक विषयों के लिए दर्शकों के बीच रुचि बढ़ाने का काम जरूर किया है। इसका कुछ फायदा बाद में आने वाली फिल्मों को मिल सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इसी विषय पर बनी हर फिल्म सफल होगी।
उनके मुताबिक ‘कांतारा’ में लोकविश्वास और स्पिरिचुअल कॉन्सेप्ट को गहराई से समझकर पेश किया गया, जबकि ‘The Vvaan’ की पृष्ठभूमि धार्मिक होने के बावजूद उसका ट्रीटमेंट उतना जड़ों से जुड़ा हुआ महसूस नहीं होता। यानी विषय एक हो सकता है, लेकिन उसका सिनेमाई असर अलग हो सकता है।
भेड़चाल से नहीं, अपनी कहानी से बनेगी पहचान
सिनेमा में किसी एक सफलता के बाद उसी तरह की कई फिल्में आना नया नहीं है। लेकिन दर्शक एक ही फॉर्मूले को बार-बार स्वीकार करे, यह जरूरी नहीं। ‘धुरंधर’ और ‘टॉक्सिक’ जैसे उदाहरणों का जिक्र करते हुए संजीव श्रीवास्तव भी इसी बात पर जोर देते हैं कि समान दिखने वाले तत्व अपने आप सफलता नहीं दिलाते। फिल्म के पीछे की सोच, विषय की समझ और उसे पर्दे पर पेश करने का तरीका ज्यादा मायने रखता है।
इसलिए अगर भारतीय लोककथाओं और आस्था से जुड़ी फिल्मों का नया दौर बन रहा है तो इसकी सफलता सिर्फ इस बात से तय नहीं होगी कि कहानी में भगवान, लोकदेवता या कोई मिथक मौजूद है।
असली फॉर्मूला आस्था नहीं, कनेक्शन है
‘हनुमान अंश’ ने आध्यात्मिक कहानी को बड़े बॉक्स ऑफिस तक पहुंचाया।
‘कांतारा’ ने क्षेत्रीय लोकविश्वास को पैन-इंडिया दर्शकों तक पहुंचाया।
‘तुम्बाड़’ ने मिथक को हॉरर में बदला।
‘महावतार नरसिम्हा’ ने पौराणिक कथा को एनीमेशन का रूप दिया।
और ‘The Vvaan’ लोकआस्था को सुपरनैचुरल थ्रिलर के जरिए पेश कर रही है।
इन सभी की भाषा अलग है।
यही शायद इस पूरे बदलाव की सबसे अहम बात है।
भारतीय सिनेमा में लौट रही हैं लोककथाएं, लेकिन पुराने रूप में नहीं।
वे हॉरर बनकर आ रही हैं।
फैंटेसी बनकर आ रही हैं।
थ्रिलर बनकर आ रही हैं।
एनीमेशन बनकर आ रही हैं।
और कभी-कभी एक संत की सरल जीवन यात्रा बनकर भी।
इसलिए इसे सिर्फ ‘भक्ति फिल्मों का दौर’ कहना शायद जल्दबाजी होगी।
यह ज्यादा बड़ा बदलाव हो सकता है—भारतीय दर्शक अपनी सांस्कृतिक जड़ों की कहानियों को आधुनिक सिनेमाई भाषा में देखना चाहता है।
लेकिन यहां भी एक शर्त है।
आस्था शुरुआत में दर्शक को सिनेमाघर तक ला सकती है, लेकिन फिल्म को वहां टिकाने का काम कहानी ही करती है।
और यही वजह है कि ‘हनुमान अंश’ ने भले एक पगडंडी बनाई हो, उस रास्ते पर आने वाली हर अगली फिल्म को अपनी राह खुद तय करनी होगी। क्योंकि आखिर में दर्शक यह नहीं पूछता कि कहानी कितनी धार्मिक है।
वह पूछता है— “क्या मैं इस कहानी से जुड़ पाया?” और शायद भारतीय सिनेमा के इस नए दौर की असली परीक्षा भी यही है।

