TMP : उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का जांच एजेंसियों को खुला चैलेंज देना महज बयानबाजी नहीं, बल्कि इसके पीछे बड़ा राजनीतिक संदेश भी देखा जा रहा है। रावत ने सीबीआई, ईडी और आयकर विभाग समेत किसी भी एजेंसी से जांच कराने की चुनौती दी है। अब सवाल यह है कि उनके इस आक्रामक रुख का चुनावी राजनीति में फायदा किसे मिलेगा और नुकसान किसका हो सकता है?
रावत को मिल सकता है ‘पीड़ित बनाम सत्ता’ वाला नैरेटिव
पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत के बयान से कांग्रेस को सबसे बड़ा फायदा राजनीतिक नैरेटिव के स्तर पर मिल सकता है। यदि कांग्रेस इस मुद्दे को जांच एजेंसियों के कथित राजनीतिक इस्तेमाल से जोड़ने में सफल रहती है, तो वह इसे केंद्र और राज्य की भाजपा सरकार के खिलाफ मुद्दा बना सकती है।
रावत ने अपने बयान में आरोप लगाया है कि चुनावी माहौल के बीच भ्रष्टाचार के मुद्दे से ध्यान हटाने के लिए जांच की कार्रवाई की जा रही है। कांग्रेस इसे सरकार बनाम विपक्ष की लड़ाई के रूप में पेश कर सकती है।
कांग्रेस के लिए फायदा, लेकिन जोखिम भी
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रावत का आक्रामक रुख कांग्रेस कार्यकर्ताओं और समर्थकों में राजनीतिक ऊर्जा पैदा कर सकता है। पार्टी इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी लड़ाई और रावत की व्यक्तिगत राजनीतिक लड़ाई दोनों के तौर पर इस्तेमाल कर सकती है।
हालांकि, इसका दूसरा पहलू भी है। यदि जांच से जुड़े आरोपों पर भविष्य में कोई ठोस तथ्य सामने आता है तो यही मुद्दा कांग्रेस के लिए राजनीतिक नुकसान का कारण बन सकता है। ऐसे में रावत का चुनौती वाला बयान भाजपा को पलटवार का मौका भी देता है।
भाजपा को मिल सकता है कांग्रेस पर हमला करने का मौका
भाजपा के लिए रावत का बयान कांग्रेस पर निशाना साधने का अवसर बन सकता है। पार्टी यह सवाल उठा सकती है कि यदि जांच एजेंसियां स्वतंत्र रूप से कार्रवाई कर रही हैं तो उसे राजनीतिक साजिश क्यों बताया जा रहा है।
भाजपा भ्रष्टाचार के पुराने आरोपों और कांग्रेस सरकारों के कार्यकाल से जुड़े मामलों को चुनावी बहस में दोबारा ला सकती है। इससे कांग्रेस को बचाव की मुद्रा में लाने की कोशिश होगी।
असली मुकाबला मुद्दे के नैरेटिव पर
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि जनता के बीच कौन सा नैरेटिव ज्यादा असर करता है।
कांग्रेस का नैरेटिव: विपक्ष की आवाज दबाने के लिए जांच एजेंसियों का इस्तेमाल।
भाजपा का नैरेटिव: जांच से डरने की बजाय जांच का सामना करना चाहिए और राजनीतिक बयानबाजी से सवालों से बचा नहीं जा सकता।
यानी एक ही बयान दोनों दलों के लिए अलग-अलग राजनीतिक हथियार बन सकता है।
रावत के लिए ‘सियासी वापसी’ का मौका?
हरीश रावत लंबे समय से उत्तराखंड कांग्रेस की राजनीति का बड़ा चेहरा रहे हैं। ऐसे में उनका इस तरह खुलकर सामने आना पार्टी के भीतर भी उनकी राजनीतिक सक्रियता और प्रभाव को फिर चर्चा में ला सकता है। यदि वह जांच के मुद्दे को उत्तराखंड के हित, भ्रष्टाचार और लोकतांत्रिक अधिकारों से जोड़कर बड़ा जनमुद्दा बनाने में सफल होते हैं, तो इसका व्यक्तिगत राजनीतिक लाभ भी उन्हें मिल सकता है।
लेकिन अगर मुद्दा केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रह गया और जनता का फोकस रोजगार, महंगाई, विकास, पलायन और स्थानीय मुद्दों पर रहा, तो इसका चुनावी असर सीमित भी हो सकता है।
चुनाव से पहले ‘जांच बनाम जवाब’ की नई लड़ाई
फिलहाल हरीश रावत के बयान ने उत्तराखंड की राजनीति में एक नया सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—क्या चुनावी लड़ाई विकास और जनमुद्दों से आगे बढ़कर जांच एजेंसियों की कार्रवाई और उसके राजनीतिक इस्तेमाल के आरोपों तक पहुंचेगी?
अगर कांग्रेस इस मुद्दे को व्यापक जनभावना से जोड़ पाती है तो उसे फायदा हो सकता है। वहीं भाजपा के लिए यह मौका होगा कि वह रावत के आरोपों को चुनौती देते हुए जांच और भ्रष्टाचार के सवाल को ही चुनावी मुद्दा बनाए। ऐसे में आने वाले दिनों में यह बयान महज सोशल मीडिया पोस्ट न रहकर उत्तराखंड की चुनावी रणनीति का हिस्सा बन सकता है।

