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विधायक निधि का रिपोर्ट कार्ड: मंत्रियों में कौन आगे, कौन पीछे? धामी से चार मंत्री निकले आगे

 

 

 

 

काशीपुर: उत्तराखंड विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले विधायकों की विधायक निधि के इस्तेमाल को लेकर तस्वीर सामने आई है। वर्ष 2022-23 से जून 2026 तक उपलब्ध विधायक निधि में करीब दो-तिहाई रकम ही खर्च हो सकी है। खास बात यह है कि सरकार में शामिल मंत्रियों के बीच भी निधि खर्च करने की रफ्तार में बड़ा अंतर दिखाई दे रहा है। आंकड़ों के मुताबिक चार मंत्री मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से आगे हैं, जबकि कुछ मंत्री उनसे काफी पीछे हैं।

काशीपुर निवासी आरटीआई कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता नदीम उद्दीन को प्राप्त जानकारी के अनुसार, वर्ष 2022-23 से जून 2026 तक कुल 1,66,400 लाख रुपये विधायक निधि के रूप में उपलब्ध हुए। इनमें से 1,09,129.19 लाख रुपये यानी करीब 66 प्रतिशत खर्च किए गए हैं। इस हिसाब से लगभग 34 प्रतिशत निधि अभी खर्च होना बाकी है।

विधानसभा का कार्यकाल अब अंतिम दौर में है। ऐसे में विधायक निधि के खर्च का यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि स्थानीय स्तर पर विकास कार्यों के लिए विधायक निधि को एक अहम माध्यम माना जाता है।

प्रदीप बत्रा सबसे आगे, धामी पांचवें नंबर पर

मंत्रियों और मुख्यमंत्री के विधायक निधि खर्च की दर पर नजर डालें तो रुड़की विधायक प्रदीप बत्रा सबसे आगे हैं। उन्होंने उपलब्ध निधि का 77 प्रतिशत खर्च किया है।

दूसरे स्थान पर सितारगंज विधायक सौरभ बहुगुणा हैं, जिनकी खर्च दर 72 प्रतिशत रही। चौबट्टाखाल विधायक सतपाल महाराज 68 प्रतिशत खर्च के साथ तीसरे स्थान पर हैं।

वहीं राजपुर रोड विधायक खजान दास ने 66.11 प्रतिशत निधि खर्च की है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी 65.61 प्रतिशत खर्च के साथ पांचवें स्थान पर हैं।

इसके बाद मसूरी विधायक गणेश जोशी 65.45 प्रतिशत, भीमताल विधायक राम सिंह कैड़ा 62 प्रतिशत और सोमेश्वर विधायक रेखा आर्य 60 प्रतिशत निधि खर्च के साथ क्रमशः आगे हैं।

नरेंद्र नगर विधायक सुबोध उनियाल की खर्च दर 57 प्रतिशत है, जबकि श्रीनगर विधायक डॉ. धन सिंह रावत 37 प्रतिशत खर्च के साथ सूची में सबसे पीछे हैं।

आंकड़ों ने खड़े किए कई सवाल

विधायक निधि के खर्च का प्रतिशत सामने आने के बाद सवाल यह भी है कि जिन क्षेत्रों में निधि का बड़ा हिस्सा खर्च नहीं हो पाया है, वहां विकास कार्यों की स्थिति क्या है। वहीं अधिक खर्च वाले क्षेत्रों में यह देखना भी जरूरी होगा कि स्वीकृत परियोजनाएं कितनी पूरी हुईं और उनका वास्तविक लाभ लोगों तक कितना पहुंचा।

क्योंकि केवल निधि खर्च होने का आंकड़ा विकास की पूरी तस्वीर नहीं बताता। किसी परियोजना में प्रशासनिक और तकनीकी स्वीकृति, भूमि उपलब्धता, टेंडर प्रक्रिया, कार्यदायी संस्था की क्षमता और भुगतान जैसी प्रक्रियाएं भी खर्च की गति को प्रभावित करती हैं।

चुनाव से पहले बढ़ी विधायक निधि की अहमियत

उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव की तैयारियों का दौर शुरू होने के बीच विधायक निधि का यह आंकड़ा राजनीतिक तौर पर भी अहम माना जा रहा है। विधायकों के लिए अपने क्षेत्र में कराए गए विकास कार्य चुनावी मुद्दों में शामिल होंगे। ऐसे में निधि के उपयोग का रिकॉर्ड उनके कार्यकाल के प्रदर्शन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।

हालांकि, विधायक निधि की खर्च दर को अकेले किसी विधायक के प्रदर्शन का अंतिम पैमाना नहीं माना जा सकता। स्वीकृत कार्य, पूर्ण परियोजनाएं, खर्च की गुणवत्ता और जनता को मिला वास्तविक लाभ—इन सभी पहलुओं को साथ रखकर ही किसी क्षेत्र का पूरा विकास रिपोर्ट कार्ड तैयार किया जा सकता है।

फिलहाल जून 2026 तक के आंकड़े इतना जरूर बताते हैं कि विधायक निधि खर्च करने की दौड़ में मंत्रियों के बीच भी बड़ा अंतर है और मुख्यमंत्री धामी से चार मंत्री आगे चल रहे हैं।

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