China Tariff Scam: अमेरिका की नजर भारत पर, चीन के माल की ‘गुप्त सप्लाई चेन’ का दावा

 

 

 

 

नई दिल्ली: अमेरिका और चीन के बीच चल रही ट्रेड वॉर अब सिर्फ दोनों देशों तक सीमित नहीं रह गई है। फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन ने भारत समेत 40 से ज्यादा देशों को कथित चीनी ट्रांसशिपमेंट नेटवर्क के संदर्भ में निगरानी के दायरे में रखा है। अमेरिकी व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने इसे “द ग्रेट ट्रांसशिपमेंट स्कैम” नाम दिया है।

नवारो की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चीन से निकलने वाले सामान को तीसरे देशों के रास्ते अमेरिकी बाजार तक पहुंचाकर ऊंचे अमेरिकी टैरिफ से बचने की कोशिश की जा सकती है। रिपोर्ट में मैक्सिको, कनाडा, यूरोपीय संघ, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया समेत कई बड़े व्यापारिक साझेदारों का उल्लेख किया गया है।

हालांकि, किसी देश का रिपोर्ट में उल्लेख होना वहां की हर कंपनी या हर निर्यातक पर आरोप नहीं है। वास्तविक कार्रवाई किसी खास कंपनी, उत्पाद या सप्लाई चेन की अमेरिकी जांच के बाद ही तय होगी।

चीन कैसे बच सकता है अमेरिकी टैरिफ से?

अमेरिकी दावों के मुताबिक, चीन से आने वाले सामान को तीसरे देश के जरिए अमेरिकी बाजार में पहुंचाने के लिए कई तरीके इस्तेमाल किए जा सकते हैं। इनमें री-लेबलिंग, री-पैकेजिंग, री-इनवॉइसिंग, मामूली प्रोसेसिंग और शिपमेंट की रूटिंग बदलना शामिल हो सकता है।

आरोप है कि इन प्रक्रियाओं के जरिए किसी उत्पाद के मूल देश को अलग दिखाने की कोशिश की जाती है, जबकि उसमें इस्तेमाल होने वाला चीनी इनपुट काफी हद तक वही रहता है।

अमेरिका को अरबों डॉलर के नुकसान का दावा

रिपोर्ट में ट्रांसशिपमेंट के संभावित पैमाने को लेकर अलग-अलग अनुमान दिए गए हैं। फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, कथित अवैध ट्रांसशिपमेंट का सालाना मूल्य 40 अरब डॉलर से लेकर 303 अरब डॉलर तक हो सकता है।

वहीं, एसोसिएटेड प्रेस के अनुसार व्हाइट हाउस का अनुमान है कि टैरिफ से बचने वाले ट्रांसशिपमेंट के कारण अमेरिका को हर साल करीब 19 अरब से 26 अरब डॉलर राजस्व का नुकसान हो सकता है। रिपोर्ट में करीब 75 अरब डॉलर का केंद्रीय अनुमान भी बताया गया है।

भारत की पुणे-गुजरात-चेन्नई बेल्ट का जिक्र

नवारो की रिपोर्ट में भारत के मैन्युफैक्चरिंग नेटवर्क का भी उल्लेख किया गया है। इसमें पुणे, गुजरात और चेन्नई को जोड़ने वाली औद्योगिक सप्लाई चेन का उदाहरण देते हुए पंप और कंप्रेसर जैसे उत्पादों का जिक्र किया गया है।

अमेरिकी प्रशासन का तर्क है कि अगर चीन में बना उत्पाद किसी तीसरे देश में सीमित स्तर की प्रोसेसिंग या अन्य कारोबारी प्रक्रियाओं के बाद अमेरिकी बाजार में भेजा जाता है, तो उसकी वास्तविक उत्पत्ति की जांच महत्वपूर्ण हो जाती है।

क्या भारतीय कंपनियों पर तुरंत कार्रवाई होगी?

फिलहाल ऐसा कहना सही नहीं होगा। रिपोर्ट में भारत का नाम आने का अर्थ यह नहीं है कि भारत से अमेरिका जाने वाले सभी उत्पादों पर अतिरिक्त टैरिफ या रोक लगा दी गई है।

लेकिन भारतीय निर्यातकों के लिए कस्टम्स जांच और डॉक्यूमेंटेशन का जोखिम बढ़ सकता है। अमेरिकी अधिकारी किसी उत्पाद की वास्तविक उत्पत्ति, उत्पादन क्षमता, सप्लाई चेन, इनवॉइस और रूटिंग की अधिक गहराई से जांच कर सकते हैं।

इसका असर उन कंपनियों पर ज्यादा पड़ सकता है जिनकी सप्लाई चेन में चीन से बड़े पैमाने पर कच्चा माल या कंपोनेंट आता है।

एआई से पकड़ा जाएगा चीन का ‘ट्रांसशिपमेंट नेटवर्क’?

इस विवाद का सबसे अहम हिस्सा अमेरिका की प्रस्तावित AI आधारित निगरानी प्रणाली है।

नवारो ने “Detective Border” जैसी AI व्यवस्था का जिक्र किया है, जिसके जरिए शिपमेंट डेटा, रूटिंग हिस्ट्री, प्रोडक्ट क्लासिफिकेशन, कंपनियों के स्वामित्व संबंध और उत्पादन क्षमता जैसे डेटा का विश्लेषण करके संदिग्ध खेपों की पहचान करने की कोशिश की जा सकती है।

अगर ऐसी प्रणाली बड़े पैमाने पर लागू होती है तो केवल कागजों पर किसी उत्पाद का देश बदलना पहले की तुलना में काफी मुश्किल हो सकता है।

भारत के लिए खतरा या बड़ा कारोबारी मौका?

अमेरिकी जांच भारत के उन कारोबारियों के लिए चुनौती बन सकती है जो चीन से बड़े पैमाने पर इनपुट लेकर अमेरिका को उत्पाद निर्यात करते हैं।

लेकिन दूसरी तरफ यही स्थिति भारत के लिए बड़ा अवसर भी बन सकती है।

अगर भारतीय कंपनियां अपनी उत्पादन क्षमता, स्थानीय वैल्यू एडिशन, सप्लाई चेन और उत्पाद के वास्तविक भारतीय मूल को स्पष्ट रूप से साबित कर पाती हैं, तो चीन से अलग एक भरोसेमंद मैन्युफैक्चरिंग बेस के तौर पर भारत की भूमिका और मजबूत हो सकती है।

सबसे बड़ा सवाल अब आगे की अमेरिकी जांच

भारत का नाम अमेरिकी रिपोर्ट में आना भारतीय कंपनियों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई का प्रमाण नहीं है, लेकिन यह संकेत जरूर है कि अमेरिका चीन से जुड़े सामान की पूरी ग्लोबल सप्लाई चेन पर निगरानी बढ़ा रहा है।

आने वाले समय में अमेरिकी कस्टम्स किन उत्पादों, कंपनियों और सप्लाई चेन को हाई-रिस्क मानता है, यही तय करेगा कि इस रिपोर्ट का भारत के निर्यात कारोबार पर वास्तविक असर कितना पड़ता है।

यानी चीन पर अमेरिकी टैरिफ की लड़ाई अब सिर्फ चीन बनाम अमेरिका नहीं रही—बल्कि पूरी ग्लोबल सप्लाई चेन इसकी अगली बड़ी लड़ाई बनती दिखाई दे रही है।

(Visited 28 times, 1 visits today)