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प्रश्नपत्र से प्रदर्शन तक: क्यों CJP आंदोलन में अपनी लड़ाई देख रहा है उत्तराखंड का प्रतियोगी छात्र?

 

 

 

TMP :  सुबह के पांच बजे हैं। अलार्म बजता है। कमरे की दीवारों पर चिपके टाइम-टेबल, प्रतियोगी परीक्षाओं की किताबें और पिछले वर्षों के प्रश्नपत्र एक बार फिर उसी उम्मीद के साथ खुलते हैं कि शायद इस बार मेहनत रंग लाएगी। उत्तराखंड के हजारों प्रतियोगी छात्रों की जिंदगी पिछले कई वर्षों से इसी दिनचर्या में गुजर रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब उनकी लड़ाई केवल परीक्षा पास करने की नहीं, बल्कि परीक्षा व्यवस्था पर भरोसा बनाए रखने की भी हो गई है।जब देशभर में CJP आंदोलन ने भर्ती परीक्षाओं की पारदर्शिता, पेपर लीक और युवाओं के भविष्य का मुद्दा उठाया, तो उत्तराखंड के प्रतियोगी छात्रों को इसमें अपनी ही कहानी दिखाई दी। क्योंकि इस राज्य ने पिछले कुछ वर्षों में ऐसी कई घटनाएं देखी हैं, जिन्होंने लाखों युवाओं के विश्वास को गहरी चोट पहुंचाई।

जब प्रश्नपत्र लीक हुआ, तब सिर्फ परीक्षा नहीं टूटी

उत्तराखंड में वर्ष 2022 का UKSSSC स्नातक स्तरीय भर्ती परीक्षा पेपर लीक मामला आज भी प्रतियोगी छात्रों की स्मृति में ताजा है। यूकेएसएसएससी घोटाले की जांच के दौरान ड्राइवर, वर्कशॉप इंस्ट्रक्टर, मत्स्य निरीक्षक, मुख्य आरक्षी पुलिस टेलीकॉम और पुलिस रैंकर्स सहित 5 अन्य भर्ती परीक्षाएं रद्द करनी पड़ी थीं। इसके बाद पटवारी-लेखपाल भर्ती परीक्षा, वन आरक्षी भर्ती, कनिष्ठ अभियंता (JE), VPDO, सचिवालय रक्षक, सहायक लेखाकार सहित कई भर्ती प्रक्रियाएं विवादों, जांच या पुनर्परीक्षा का हिस्सा बनीं।

एकदम ताजा लीक- उत्तराखंड प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (यूटीयू) सेमेस्टर परीक्षा (2026): जुलाई 2026 में बीटेक के दो विषयों—’मशीन लर्निंग फॉर इंटरनेट ऑफ थिंग्स’ और ‘इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड थ्योरी’ के प्रश्नपत्र परीक्षा से पहले व्हाट्सएप और पोर्टल पर लीक होने के कारण रद किए गए।इन घटनाओं ने केवल भर्ती प्रक्रिया को प्रभावित नहीं किया, बल्कि हजारों युवाओं के मन में यह सवाल भी पैदा कर दिया कि क्या मेहनत और योग्यता ही सफलता का आधार रह गई है, या व्यवस्था की कमजोरियां उनकी तैयारी पर भारी पड़ सकती हैं।

हर रद्द हुई परीक्षा के साथ किसी छात्र की उम्र बढ़ी, किसी परिवार पर आर्थिक बोझ बढ़ा और किसी अभ्यर्थी का आत्मविश्वास कम हुआ। पहाड़ के दूरदराज गांवों से देहरादून और हल्द्वानी तक कोचिंग लेने आए युवाओं के लिए यह केवल परीक्षा नहीं, पूरे परिवार के सपनों का सवाल है।

समस्या केवल पेपर लीक नहीं, पूरी भर्ती व्यवस्था है

विशेषज्ञ मानते हैं कि पेपर लीक समस्या का सबसे दिखाई देने वाला हिस्सा है। इसके पीछे एक और बड़ी चुनौती है—सरकारी विभागों में वर्षों से लंबित भर्तियां और रिक्त पद।

प्रतियोगी छात्र संगठनों का कहना है कि कई विभाग समय पर अधियाचन नहीं भेजते, कई भर्तियां वर्षों तक अटकी रहती हैं और परीक्षा होने के बाद भी नियुक्ति प्रक्रिया लंबी खिंच जाती है। ऐसे में अभ्यर्थियों को दोहरी मार झेलनी पड़ती है—एक ओर प्रतियोगिता बढ़ती है, दूसरी ओर आयु सीमा पार होने का खतरा भी।यही कारण है कि आज आंदोलन का स्वर केवल “पेपर लीक बंद करो” तक सीमित नहीं है। अब मांग है कि राज्य सरकार सभी विभागों के रिक्त पदों का वास्तविक आंकड़ा सार्वजनिक करे, नियमित भर्ती कैलेंडर जारी करे और चयन से नियुक्ति तक की समय-सीमा तय करे।

उत्तराखंड में यह मुद्दा इतना बड़ा क्यों है?

उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में सरकारी नौकरी आज भी सबसे भरोसेमंद रोजगार मानी जाती है। सीमित उद्योग, निजी क्षेत्र में अपेक्षाकृत कम अवसर और लगातार हो रहे पलायन के बीच प्रतियोगी परीक्षाएं युवाओं के लिए बेहतर भविष्य का सबसे बड़ा माध्यम हैं।इसी कारण जब भर्ती प्रक्रिया प्रभावित होती है तो उसका असर केवल एक अभ्यर्थी पर नहीं, बल्कि पूरे परिवार और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। गांवों से शहरों तक कोचिंग, किराया, किताबों और तैयारी पर होने वाला खर्च भी परिवारों पर अतिरिक्त दबाव डालता है।

सरकार का पक्ष: सुधार की दिशा में कदम

राज्य सरकार इन आरोपों से पूरी तरह सहमत नहीं है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और सरकार लगातार यह कहती रही है कि पेपर लीक की घटनाओं के बाद व्यवस्था में व्यापक सुधार किए गए हैं।सरकार के अनुसार वर्ष 2023 में लागू उत्तराखंड प्रतियोगी परीक्षा (भर्ती में अनुचित साधनों की रोकथाम एवं निवारण) अधिनियम देश के सबसे सख्त नकल-रोधी कानूनों में शामिल है। पेपर लीक मामलों में एसटीएफ ने कई आरोपियों को गिरफ्तार किया, परीक्षा प्रक्रियाओं में तकनीकी निगरानी बढ़ाई गई और भर्ती एजेंसियों की जवाबदेही मजबूत की गई।

सरकार यह भी दावा करती है कि पिछले कुछ वर्षों में 17 हजार से अधिक युवाओं को विभिन्न सरकारी विभागों में नियुक्तियां दी गई हैं। शिक्षा, पुलिस, स्वास्थ्य, राजस्व, वन और अन्य विभागों में चरणबद्ध भर्ती प्रक्रिया जारी है तथा रिक्त पदों का अद्यतन विवरण लेकर आगे की नियुक्तियों पर काम किया जा रहा है।

फिर भी युवाओं के सवाल खत्म क्यों नहीं हुए?

यही वह बिंदु है जहां सरकार और प्रतियोगी छात्रों के बीच दृष्टिकोण अलग दिखाई देता है। सरकार नियुक्तियों और सुधारों को उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करती है, जबकि प्रतियोगी छात्र पूछते हैं कि यदि व्यवस्था पहले से अधिक पारदर्शी है, तो फिर विभागवार रिक्त पदों का पूरा ब्यौरा सार्वजनिक क्यों नहीं किया जाता? यदि हजारों नियुक्तियां हुई हैं, तो अब भी कितने पद खाली हैं? क्या सभी भर्तियों के लिए वार्षिक कैलेंडर जारी होगा? क्या परीक्षा से नियुक्ति तक अधिकतम समय-सीमा तय की जाएगी?

राज्य सरकार द्वारा वर्ष 2023 में विधानसभा सत्र के दौरान साझा किए गए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, कुल स्वीकृत 2,57,940 पदों में से 68,586 पद खाली थे। उत्तराखंड सरकार और वित्त विभाग के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, वर्तमान में राज्य के विभिन्न विभागों, निगमों और बोर्डों में कुल 66,317 पद रिक्त चल रहे हैं। हालांकि विभागवार आंकड़ा सरकार ने नहीं दिया है।

युवाओं का कहना है कि विश्वास केवल कानून बनाने से नहीं लौटेगा। विश्वास तब लौटेगा, जब हर अभ्यर्थी को यह भरोसा होगा कि उसकी परीक्षा समय पर होगी, प्रश्नपत्र सुरक्षित रहेगा, परिणाम निर्धारित समय में आएगा और चयन के बाद नियुक्ति भी बिना अनावश्यक देरी के मिलेगी।

अब आंदोलन का अर्थ बदल चुका है

CJP आंदोलन को उत्तराखंड का प्रतियोगी छात्र केवल एक राष्ट्रीय विरोध प्रदर्शन के रूप में नहीं देख रहा। उसके लिए यह अपनी वर्षों की पीड़ा, संघर्ष और उम्मीदों को आवाज देने का माध्यम बन चुका है।यह आंदोलन सरकार बनाम छात्र की लड़ाई नहीं है। यह उस व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, जवाबदेह और समयबद्ध बनाने की मांग है, जिस पर लाखों युवाओं का भविष्य टिका हुआ है।

आखिरकार सवाल भरोसे का है

प्रश्नपत्र लीक होने से एक परीक्षा दोबारा कराई जा सकती है, लेकिन एक बार टूटा भरोसा दोबारा बनाना आसान नहीं होता। उत्तराखंड का युवा आज भी पढ़ रहा है, तैयारी कर रहा है और प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठ रहा है। उसने उम्मीद नहीं छोड़ी है। लेकिन अब उसकी सबसे बड़ी मांग केवल नौकरी नहीं, बल्कि एक ऐसी परीक्षा व्यवस्था है जिसमें उसकी मेहनत, ईमानदारी और योग्यता पर किसी तरह का संदेह न हो।शायद इसी वजह से CJP आंदोलन की सबसे बड़ी गूंज उत्तराखंड के प्रतियोगी छात्र के मन में सुनाई देती है—क्योंकि उसके लिए यह केवल आंदोलन नहीं, अपने भविष्य को बचाने की पुकार है।

उत्तराखंड लोक सेवा आयोग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. राकेश कुमार परीक्षा प्रणाली को अभेद्य और सुरक्षित बनाने के लिए मजबूत एक्सपर्ट पूल के गठन, प्रश्न पत्रों की मल्टी-लेयर डिजिटल सुरक्षा, आंतरिक जवाबदेही और रोटेशन पॉलिसी तथा कड़े तकनीकी प्रोटोकॉल लागू करने के सुझाव देते हैं।
उत्तराखंड बेरोजगार संघ के अध्यक्ष बॉबी पंवार कहते हैं- केवल कानून बना देना काफी नहीं है। समयबद्ध भर्ती कैलेंडर बनाना चाहिए, अधिसूचना से लेकर नियुक्ति पत्र देने तक की अधिकतम समय सीमा तय होनी चाहिए। एकल पंजीकरण और सख्त दस्तावेज़ सत्यापन होनाच चाहिए और छात्रों की मांग के अनुसार भर्ती के लिए पारदर्शी वन-टाइम रजिस्ट्रेशन सिस्टम मजबूत होना चाहिए। व्हिसलब्लोअर को संरक्षण मिलना चाहिए, ना कि उन्हें प्रताड़ित किया जाए।

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