TMP : देश में आयुष पद्धतियों से इलाज कराने वाले करोड़ों मरीजों और डॉक्टरों से जुड़े एक अहम मुद्दे पर अब सुप्रीम कोर्ट ने दखल दिया है। एलोपैथिक डॉक्टरों की तरह आयुष डॉक्टरों को भी “पंजीकृत मेडिकल प्रैक्टिशनर” का दर्जा देने की मांग वाली जनहित याचिका पर शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार के तीन मंत्रालयों—कानून, स्वास्थ्य और आयुष—से जवाब तलब किया है।
इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने की। याचिका में तर्क दिया गया है कि मौजूदा कानूनी ढांचा आयुष और अन्य गैर-एलोपैथिक डॉक्टरों को वह वैधानिक पहचान नहीं देता, जिसकी वजह से न सिर्फ उनकी पेशेवर स्थिति प्रभावित होती है, बल्कि मरीजों तक सही और प्रमाणिक जानकारी भी नहीं पहुंच पाती।
याचिका में 1954 के औषधि एवं चमत्कारिक उपचार (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। इसमें कहा गया है कि यह कानून ऐसे समय में बना था, जब चिकित्सा विज्ञान और वैकल्पिक पद्धतियां आज जैसी विकसित नहीं थीं। आज भी उसी पुराने ढांचे के आधार पर कई बीमारियों से जुड़ी दवाओं और उपचारों के विज्ञापन पर पूरी तरह रोक लगी हुई है, चाहे जानकारी सही और वैज्ञानिक ही क्यों न हो।
याचिकाकर्ता का कहना है कि आयुष डॉक्टरों को “रजिस्टर्ड डॉक्टर” की श्रेणी से बाहर रखने के कारण वे कानून के तहत मिलने वाले कुछ अधिकारों और अपवादों से वंचित रह जाते हैं। नतीजतन गंभीर बीमारियों से जुड़ी वैध और प्रमाणिक आयुष दवाओं की जानकारी आम लोगों तक नहीं पहुंच पाती और भ्रम की स्थिति बनी रहती है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मुद्दे को गंभीर मानते हुए केंद्र सरकार से स्पष्ट रुख मांगा है। अब यह देखना अहम होगा कि क्या अदालत इस पुराने कानून की समीक्षा और आयुष डॉक्टरों की कानूनी स्थिति को लेकर कोई बड़ा रास्ता खोलती है, जिससे वैकल्पिक चिकित्सा को भी मुख्यधारा में समान पहचान मिल सके।
