रविवार विशेष | उत्तराखंड
घर की पूजा से विवाह तक… पहाड़ की रसोई में इन पकवानों के साथ परोसी जाती है आस्था, परंपरा और पीढ़ियों की विरासत
ALKA PANT : उत्तराखंड के पहाड़ी समाज में प्रकृति, परंपरा और पकवान का अनोखा संबंध है कोई भी अवसर, उत्सव, या आराधना बिना किसी विशेष पकवान के संपन्न नहीं हो सकती। यहां कई व्यंजन ऐसे हैं, जिनके साथ धार्मिक आस्था, पारिवारिक परंपरा और शुभता की भावना जुड़ी हुई है। घर में होने वाले हर शुभ कार्य जन्मदिन से लेकर, शादी-ब्याह, गृह प्रवेश, पूजा-पाठ, नामकरण संस्कार, कथा-कीर्तन, या किसी नए कार्य की शुरुआत—इन सभी अवसरों पर रसोई में कुछ विशेष पकवान जरूर तैयार किए जाते हैं।हालांकि गढ़वाल और कुमाऊं के अलग-अलग क्षेत्रों में परंपराओं में अंतर देखने को मिलता है, लेकिन कुछ व्यंजन ऐसे हैं जो लगभग हर मांगलिक अवसर की थाली में अपनी जगह बनाए हुए हैं। और परंपरा निभाने के लिए सही इनको बनाना अघोषित रूप से अनिवार्य है। आज हम ऐसे ही पाँच पकवानों की बात करेंगे जो शुभ अवसरों पर उत्तराखंड के हर पहाड़ी घर में बनाए जाते है।
1. उड़द के पकौड़े: स्वाद के साथ जुड़ी परंपरा
सबूत उड़द की दाल से बने पकौड़े उत्तराखंड में हर शुभ कार्य के परिचायक है और इसका बनना उतना ही जरूरी है, जितना पूजा या कथा करने के लिए पंडित जी का होना। वैदिक परंपरा में भी उड़द की दाल को महत्वपूर्ण व शुभ माना जाता हैं। मांगलिक अवसरों पर बनाए जाने वाले इन पकौड़ों का स्वाद जितना खास होता है, इसकी पौष्टिकता भी पहाड़ी परिवेश में महत्वपूर्ण हो जाती है। इन पकौड़ों को बनाने के लिए सबूत उड़द की दाल को रात को पानी में भिगो दिया जाता है और सुबह उठकर स्नान इत्यादि से निवृत होकर सबसे पहले घर की महिलाएँ इसे तब तक साफ़ करती हैं जब तक कि इसका सारा छिलका न निकल जाये। उसके बाद इसे सिलबट्टे पर पीसा जाता है। उसके पश्चात इस पीसी हुई दाल में नमक, हींग, हल्दी, मिर्च मिलाकर एक से मिक्स किया जाता है ताकि सभी मसलों और नमक इसमें मिल जाये। इसके बाद मालू के पत्तों में इसे रखकर इसे फैलाकर पकोड़िया बनाई जाती है, जिन पर ऊपर से काले तिल लगाना आवश्यक होता है। फिर इन्हें सरसों के तेल में धीमी आँच पर ताला जाता है और सबसे पहले अग्नि देव, पितृ और भगवान के लिए रखा जाता है।पकौड़ों की खुशबू अक्सर पूरे घर को उत्सव की ख़ुशबू से भर देती है।
2. गेंहू के आटे की पूरी और स्वाले : शुभ अवसर की पहचान और पकौड़ों की साथी
उत्तराखंड में गेंहू के आटे की पूरी को मांगलिक भोजन का अहम हिस्सा माना जाता है। पूजा में बनने वाले उड़द के पकौड़ों और पूरी के साथ होने पर ही भगवान का भोग पूर्ण माना जाता है। पहाड़ के गांवों में आज भी जब किसी घर में शादी या पूजा होती है तो परिवार और पड़ोसी मिलकर पूरी बनाने की तैयारी करते हैं। गाँव में महिलाये अपने अपने घर से चकला बेलन लेकर और २-३ के समूह में मिलकर पूरी को बेलती हैं और फिर एक बड़ी कड़ाई में बहुत सारी पूरियों को एक साथ तला जाता है। इस तरह से ये सिर्फ एक व्यंजन नहीं, बल्कि सामूहिकता और उत्सव का प्रतीक बन जाती है।उत्तराखंड में गर्मागर्म पूरी, उड़द के पकौड़े, आलू की सब्जी और पहाड़ी रायते के साथ परोसी गई थाली मेहमानों के स्वागत का पारंपरिक तरीका रही है।कभी कभी पूरी को स्वाले के रूप में भी बनाया जाता है। स्वाले एक प्रकार की भरी हुई पूरी होती है जिसमे उडद की दाल को पीस कर उसमे कुछ मसाले मिलाकर थोड़ा बड़े साइज की पूरी में भर कर ताला जाता है। स्वाले ना केवल स्वादिष्ट होते हैं बल्कि इन्हें एक सम्पूर्ण आहार मान है।इसे भी पकौड़ों की तरह सरसों के तेल या घी में मध्यम आंच पर तला जाता है।
3. गेंहूँ के आटे की पंजीरी: प्रसाद में छिपी श्रद्धा
आटे की पंजीरी उत्तराखंड के घरों में पूजा-पाठ, कथा-कीर्तन जैसे धार्मिक अवसरों से जुड़ा एक पारंपरिक प्रसाद है।जो भगवान को भी चढ़ाया जाता है।गेंहूँ के आटे की ये पींजरी जितनी महत्वपूर्ण है बनाने में उतनी सरल और और स्वाद के तो कहने ही क्या है। इसे बनाने के लिए , गेंहूँ का आटा, शुद्ध घी, चीनी या गुड़ और सूखे नारियल से तैयार होने वाली पंजीरी को भगवान को भोग लगाने के बाद प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।इसकी खासियत केवल इसका स्वाद नहीं, बल्कि वह भावना है जो इसे बनाते और बांटते समय जुड़ती है। एक छोटी-सी कटोरी पंजीरी में परिवार की आस्था और संस्कारों की मिठास समाई होती है।
4. सूजी का हलवा: हर शुभ शुरुआत की मिठास
किसी नए काम की शुरुआत हो या पूजा का अवसर, सूजी का हलवा उत्तराखंड सहित पूरे उत्तर भारत में शुभ माना जाता है।परंतु उत्तराखंड में कभी भी कोई पूजा या धार्मिक आयोजन हो, ख़ुशी का अवसर हो, त्यौहार हो या फिर मेहमान आए हों, तो सूजी का हलवा बनना अनिवार्य है।बाक़ी स्थानों से अलग यहाँ सूजी को शुद्ध घी में भून कर उसमे गुड़ या चीनी के साथ पानी डाल कर तब तक पकाया जाता है जब तक इसमें से पानी सूख ना जाये। साथ ही ऊपर से काकर डाला गया सूखा नारियल इसे खास बना देता हैं। पूजा के बाद भगवान को भोग लगाकर इसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।कई पहाड़ी परिवारों में आज भी किसी शुभ समाचार या मंगल कार्य की शुरुआत हलवा बनाकर की जाती है। लड्डू के बाद अगर मीठे की बात हो तो उत्तराखंड में सूजी ही प्रमुखता से बनाई जाती है।
5. खुसका भात या मीठे चावल: खुशहाली का प्रतीक
‘खुसका भात, नाम से ही अनुमान होता है कि यह चावल का एक ख़ुश्क या सूखा व्यंजन है। जिसमें चावल को घी के साथ भून कर गुड़ के पानी में पकाया जाता है। यह एक तरह का गुड वाला भात है जिसमे मेवे के रूप में सूखे नारियल जिसे ‘गोला’ भी कहते है, के लंबे मगर चौड़े और पतले टुकड़े डाले जाते है। इसके अलावा कई अवसरों पर गुड से बनने वाला यह पकवान सुख और दुख दोनों दोनों अवसरों पर थाली में परोसा जाता है। यह उत्तराखंडी थाली का सबसे आकर्षक व्यंजन भले ही ना हो परंतु महत्वपूर्ण अवश्य है।
उत्तराखंड में वसंत पंचमी, विशेष पूजाओं और पारिवारिक आयोजनों विशेषकर शादी में जैसे बड़े अवसरों में इसका विशेष महत्व होता है। इसे समृद्धि, मिठास और शुभता का प्रतीक माना जाता है।घर में शुभ अवसरों के अतिरिक्त पितृ भोज में भी ‘खुसका भात’ को ‘छाछ की कढी’ के साथ परोसा जाता है।
जब पकवान बन जाते हैं रिश्तों की डोर
आज बाजार में तरह-तरह के व्यंजन उपलब्ध हैं, लेकिन पहाड़ के उपरोक्त पारंपरिक पकवानों की जगह अब भी अलग है। इन व्यंजनों में केवल स्वाद नहीं, बल्कि पुरखों की सीख, परिवार का साथ और संस्कृति की खुशबू बसती है।उत्तराखंड की शुभ अवसरों वाली थाली हमें याद दिलाती है कि भोजन हमारी पहचान का हिस्सा है। पीढ़ियां बदल जाती हैं, घरों की बनावट बदल जाती है, लेकिन पूजा के दिन रसोई में उठती घी और मसालों की खुशबू आज भी वही पुरानी यादें ताजा कर देती है।उम्मीद है आपको ये जानकारी पसंद आएगी। हर रविवार ऐसे ही पहाड़ी पकवानों की जानकारी लेकर हम आते रहेंगे।
