Site icon The Mountain People

ग्लेशियर टूटने से आई नेपाल में तबाही! 5,140 मीटर से शुरू हुआ मौत का सैलाब

Workers use excavators to clear the mud at the Dhunge Bazaar in Nepal's Nuwakot district on August 29, 2026, after flash floods and landslides hit the Nepal-Tibet border. (Photo by PRABIN RANABHAT/AFP)

 

 

 

काठमांडू : नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ के पीछे की तस्वीर अब धीरे-धीरे साफ होती जा रही है। तिब्बत में एक पर्यटक के कैमरे में कैद वीडियो ने उस घटना की कड़ी सामने ला दी है, जिसे विशेषज्ञ नेपाल-तिब्बत सीमा पर हुई भीषण तबाही का संभावित स्रोत मान रहे हैं। चीनी मीडिया ने इस फुटेज को साझा किया है और पर्वतीय आपदा विशेषज्ञों ने वीडियो में दिख रहे क्षेत्र को रिमोट-सेंसिंग से चिन्हित आपदा क्षेत्र से जोड़कर देखा है।

चीनी पर्वतीय आपदा एवं पर्यावरण संस्थान के निदेशक कांग शिचांग के मुताबिक वीडियो में नजर आने वाला क्षेत्र उन सैटेलाइट तस्वीरों से मेल खाता है, जहां से आपदा की शुरुआत होने का अनुमान लगाया गया है। चीनी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के अनुसार, फुटेज में नेपाल की ओर ऊंचाई वाले क्षेत्र में ग्लेशियर के टूटने की घटना दिखाई देती है। माना जा रहा है कि इसी घटना के बाद बर्फ, चट्टान और भारी मलबा तेजी से नीचे आया और नेपाल-तिब्बत सीमा पर स्थित ग्योंग पोर्ट में विनाशकारी लैंडस्लाइड का कारण बना।

5,140 मीटर की ऊंचाई पर टूटा ग्लेशियर

चीनी रिपोर्टों के मुताबिक ग्लेशियर करीब 5,140 मीटर की ऊंचाई पर ढहा। इस घटना से लगभग 6.2 लाख वर्ग मीटर क्षेत्र प्रभावित हुआ। ग्लेशियर से निकला मलबा करीब 20 किलोमीटर तक नीचे की ओर बढ़ा और लगभग सात मिनट में ग्योंग पोर्ट क्षेत्र तक पहुंच गया।

इस दौरान बर्फ, चट्टान, मिट्टी और मलबे का विशाल प्रवाह पहाड़ी घाटियों से होकर नीचे उतरा। इसकी रफ्तार और मात्रा इतनी अधिक थी कि रास्ते में आने वाले सड़क मार्ग, पुल, इमारतें और दूसरे बुनियादी ढांचे इसकी चपेट में आ गए।

यही वजह है कि इस घटना को सामान्य बाढ़ के बजाय ग्लेशियर टूटने के बाद पैदा हुई cascading disaster यानी एक के बाद एक कई आपदाओं की श्रृंखला के रूप में देखा जा रहा है।

पहले ग्लेशियर टूटा, फिर नदी बनी खतरा

घटना का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि ग्लेशियर टूटने के बाद भी खतरा खत्म नहीं हुआ। भारी मलबे ने नदी के प्रवाह को प्रभावित किया और ऊपरी हिस्से में पानी जमा होने से अस्थायी अवरोधक झील बन गई।

अब इसी झील को लेकर नेपाल और चीन दोनों चिंतित हैं।

चीनी अधिकारियों ने नेपाल को चेतावनी दी है कि प्राकृतिक अवरोध कमजोर पड़ने या टूटने की स्थिति में अचानक भारी मात्रा में पानी नीचे की ओर आ सकता है। उपलब्ध मॉडलिंग के मुताबिक आंशिक अवरोध टूटने पर नदी तंत्र में पानी का अधिकतम बहाव लगभग 500 घन मीटर प्रति सेकंड तक पहुंचने की आशंका जताई गई है।

इस चेतावनी ने पहले से तबाह इलाकों में दूसरी बाढ़ की आशंका बढ़ा दी है। यही कारण है कि प्रभावित नदी घाटियों और निचले क्षेत्रों में निगरानी बढ़ाई गई है।

626 मौतें, 2,426 लोग अब भी लापता

नेपाल के राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण के शनिवार सुबह के आंकड़ों के मुताबिक आपदा में 626 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 2,426 लोग अब भी लापता हैं।

अब तक 4,451 लोगों को सुरक्षित निकाला जा चुका है और 101 घायलों का अस्पतालों में इलाज चल रहा है। लापता लोगों में 27 पुलिसकर्मी भी शामिल हैं।

बचाव अभियान में नेपाल के करीब 15,224 सुरक्षाकर्मी लगाए गए हैं। दुर्गम पहाड़ी इलाकों, क्षतिग्रस्त सड़कों और पुलों तथा लगातार बने हुए नए खतरे के कारण रेस्क्यू टीमों के सामने चुनौती लगातार बनी हुई है।

वीडियो ने बदली आपदा की तस्वीर

इस पूरी घटना में पर्यटक द्वारा बनाया गया वीडियो इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि यह उस क्षण की दृश्य जानकारी देता है, जब ऊंचाई वाले इलाके में बर्फ और मलबे का विशाल हिस्सा नीचे की ओर खिसका।

अगर विशेषज्ञों का आकलन सही साबित होता है, तो यह फुटेज आपदा के संभावित शुरुआती बिंदु को समझने में महत्वपूर्ण वैज्ञानिक सबूत बन सकता है।

सैटेलाइट इमेजरी और जमीनी सर्वे के साथ इस वीडियो का मिलान भविष्य में यह पता लगाने में मदद कर सकता है कि ग्लेशियर का कौन-सा हिस्सा टूटा, मलबे ने नदी को किस तरह प्रभावित किया और कितनी तेजी से यह पूरा घटनाक्रम नीचे की ओर बढ़ा।

नेपाल के बाद सवाल भारत के हिमालय पर भी

नेपाल की यह त्रासदी सिर्फ नेपाल की समस्या नहीं है। हिमालय एक साझा भौगोलिक क्षेत्र है और यहां बनने वाली प्राकृतिक घटनाओं का असर सीमाओं से परे जा सकता है।

ग्लेशियरों का पीछे हटना, ऊंचाई वाले क्षेत्रों में बर्फ और चट्टानों का अस्थिर होना, ग्लेशियर झीलों का बढ़ना और नदी घाटियों में बड़े पैमाने पर निर्माण—इन सभी को अब एक साथ देखने की जरूरत है।

उत्तराखंड समेत हिमालयी राज्यों के लिए नेपाल की घटना एक गंभीर चेतावनी है। सिर्फ बारिश का अलर्ट पर्याप्त नहीं है। जरूरत ऐसे सिस्टम की है जो ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ग्लेशियर टूटने, मलबे के अचानक नीचे आने और नदी में संभावित उफान की जानकारी समय रहते नीचे बसे लोगों तक पहुंचा सके।

नेपाल में इस बार तबाही कुछ मिनटों में पहाड़ से नदी और नदी से बस्तियों तक पहुंच गई।

अब असली सवाल यह है—क्या अगली बार हिमालय के खतरे का पता तब चलेगा, जब तबाही शुरू हो चुकी होगी, या उससे पहले?

 

 

 

Exit mobile version