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‘319 CrPC का इस्तेमाल सावधानी से हो’, सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों को चेताया

 

पीटीआई: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि अदालतों को किसी अपराध में दोषी माने जाने वाले व्यक्ति के खिलाफ कार्यवाही करने की शक्ति का इस्तेमाल बहुत सावधानी से करना चाहिए, यह शक्ति किसी को परेशान करने का तरीका नहीं बननी चाहिए। अदालत ने कहा कि धारा 319 CrPC का मकसद न्याय को आगे बढ़ाना है, न कि किसी व्यक्ति को प्रताड़ित करना।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस जायमाल्या बागची की पीठ ने यह टिप्पणी सीआरपीसी की धारा 319 से संबंधित एक हत्या के मामले की सुनवाई करते हुए की। इस धारा के तहत अदालत को किसी व्यक्ति को, जो अभियुक्त नहीं है, उसे भी सुनवाई के दौरान तलब करने का अधिकार है।

हत्या के मामले में हुआ विवाद

यह मामला 2017 में उत्तर प्रदेश के कौशांबी में हुई हत्या से जुड़ा है। इस मामले में निचली अदालत ने एक व्यक्ति को सीआरपीसी की धारा 319 के तहत तलब किया था। इसके खिलाफ आरोपी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसके बाद हाईकोर्ट ने पिछले साल जुलाई में निचली अदालत का समन आदेश रद्द कर दिया था।

इसके खिलाफ मामले के शिकायतकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी, जिस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट का आदेश गलत है और निचली अदालत का समन आदेश वैध है। अदालत ने हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए निचली अदालत का समन आदेश बहाल कर दिया।

मुकदमा 18 महीने में निपटाने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने मामले से जुड़े सभी पक्षकारों को 28 अगस्त को निचली अदालत में पेश होने का आदेश दिया है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस हत्या के मुकदमे को 18 महीने के भीतर पूरा किया जाए ताकि पीड़ित परिवार को समय पर न्याय मिल सके।

क्यों अहम है सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी?

भारत में कई बार अदालतों में धारा 319 का इस्तेमाल शिकायतकर्ता या पुलिस द्वारा आरोपियों को परेशान करने के लिए किया जाता है। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी अदालतों को यह याद दिलाने के लिए महत्वपूर्ण है कि कानूनी शक्तियों का दुरुपयोग न हो और न्याय प्रक्रिया का उद्देश्य न्याय सुनिश्चित करना है, न कि प्रतिशोध।

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