देहरादून : रायपुर विधानसभा क्षेत्र के नालापानी के पास स्थित खलंगा वन क्षेत्र में 40 बीघा से अधिक संरक्षित वन भूमि पर अवैध निर्माण और अतिक्रमण की खबर सामने आते ही क्षेत्र में जनता का गुस्सा फूट पड़ा।
उत्तराखंड सरकार के राजधानी में 900 बीघा भूमि पर कार्रवाई के दावों के बीच इस खुलासे ने भू-प्रबंधन व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मोर्चे पर उतरे मोहित डिमरी
उत्तराखंड स्वाभिमान मोर्चा के प्रदेश महासचिव और मूल निवास भू-कानून संघर्ष समिति के संस्थापक मोहित डिमरी ने जैसे ही इस अतिक्रमण की जानकारी पाई, वह अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंचे।
उन्होंने न केवल निर्माण कार्य को तत्काल रुकवाया, बल्कि मौके पर लगे बड़े गेट को भी हटवाया। इस दौरान स्थानीय लोग भी खुलकर उनके साथ आए और अवैध कब्जे के खिलाफ एकजुट विरोध दर्ज कराया।
आरोपों की बौछार – पेड़ों की कटाई, राजनीतिक संरक्षण
स्थानीय निवासियों ने आरोप लगाया है कि रातोंरात सैकड़ों पेड़ काटे गए, जबकि वन विभाग और सरकार मौन धारण किए बैठी है। आरोपों की जद में स्थानीय विधायक और वन विभाग के अधिकारी भी हैं।
डिमरी ने चेतावनी दी,
“अगर सरकार की मिलीभगत से जंगलों को भू-माफियाओं के हवाले किया जा रहा है, तो हम चुप नहीं बैठेंगे। उत्तराखंड की जल-जंगल-जमीन को लूटने वालों का खुला विरोध होगा।”
कार्रवाई का आश्वासन, मगर जनता को भरोसा नहीं
घटनास्थल पर उप वन संरक्षक ने पहुंच कर जांच का आश्वासन दिया है, लेकिन मोर्चा और स्थानीय नागरिकों की मांग है कि पूरे क्षेत्र में पेड़ों की गिनती (Tree Census) कराई जाए ताकि भविष्य में ऐसे अपराधों पर लगाम लगाई जा सके।
वन भूमि पर अतिक्रमण केवल एक ज़मीन कब्जाने की घटना नहीं, बल्कि यह उत्तराखंड की अस्मिता, पर्यावरण और भविष्य पर हमला है।
उत्तराखंड स्वाभिमान मोर्चा ने ऐलान किया है कि भू-माफिया हो या भ्रष्ट तंत्र, हर स्तर पर निर्णायक लड़ाई लड़ी जाएगी।

